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राजा एवं राजपद
शुक्र ने राजपद को केन्द्रीय महत्व प्रदान किया है, राजा का प्रमुख कर्तव्य प्रजा-रंजन है। राजा के बिना प्रजा ऐसे ही नष्ट हो जाती है, जैसे मल्लाह रहित नौका नष्ट हो जाती है।
राजपद सम्बन्धी विभिन्न अवधारणा
(1) देवांश सम्बन्धी धारणा :- शुक्र के अनुसार राजा का निर्माण आठ देवताओं के अंश से हुआ है - इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरूण, चन्द्रमा तथा कुबेर। जो राजा इन देवताओं के गुणों के अनुसार सदाचरण करता है, वही वास्तव में देवांश राजा होता है।
(2) राजपद की तप सम्बंधी धारणा :- शासन करना तप के समान माना जाता है और तप तीन प्रकार का होता है - सात्विक, राजसिक और तामासिक। सात्विक राजा सभी कर्त्तव्यों का नीति के अनुसार पालन करता है, राजासिक राजा वासना एवं विषयों में आसक्त होता है एवं तामसी राजा कर्त्तव्यहीन एवं नीति का उल्लंघन करने वाला होता है सात्विक राजा, श्रेष्ठ, राजसिक राजा मध्यम एवं तामसिक राजा निकृष्ट श्रेणी का होता है।
(3) राजा की प्रजा-सेवक सम्बन्धी धारणा :- शुक्र के अनुसार, ब्रह्मा ने राजा को ऐसा प्रजा-सेवक बनाया है, जिसे वेतन के रूप में प्रजा से कर प्राप्त होता है, इसलिए राजा को प्रजा से कर ग्रहण करके सेवक की भांति प्रजा की रक्षा एवं सेवा करनी चाहिए।
(4) संविदा सम्बन्धी धारणा :- मनु के विपरीत, शुक्र राजा को तब तक ही राजा मानते हैं, जब तक वह धर्मशील होता है। यदि वह अधर्मशील हो तो प्रजा को चाहिए कि ऐसे राजा को त्यागकर, श्रेष्ठ राजा की शरण में जाने का विचार बनाए, ताकि भयभीत होकर राजा धर्मशील बन जाए।[
राजा के देवत्व पर विचार
शुक्र ने राजा को आठ देवताओं के अंश से निर्मित बताया है। शुक्र ऐसे भारतीय विचारक हैं, जिन्होंने राजा के प्रत्यक्ष देव होने की धारणा का विरोध किया है।
शुक्र ने न तो राजा को ‘देव‘ स्वीकार किया है और न ही उसके दैवी अधिकार माने है, परन्तु उसके दायित्वों की दिव्यता का स्पष्टीकरण अवश्य ही किया हें। दायित्वों की दिव्यता के कारण स्वयं शासक भी अपनी इच्छा से इन दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकता। राजधर्म का पालन करने से क्षुद्र राजा भी श्रेंष्ठ बन जाता है, जबकि इसके विपरीत आचरण करने से उत्तम राजा भी क्षुद्र बन जाता है।
राजा का वर्गीकरण
(१) गुण व कर्म के आधार पर :- (1) सात्विक (2) राजस और (3) तामस तीन प्रकार के राजा, शुक्रनीति में माने गऐ है।
(२) सत्तासीन एवं दस्युराजा :- जब किसी राजा को उसके शत्रु सत्ता से बाहर कर देते हैं तो ऐसा राजा ‘दस्यु राजा‘ का जीवन व्यतीत करता है।
(३) वार्षिक आय के आधार पर वर्गीकरण :- शुक्र ने राजाओं की वार्षिक आय के आधार पर आठ प्रकार के राजाओं का उल्लेख किया है-
1. सामन्त 2. माण्डलिक 3. राजा 4. महाराजा
5. स्वराट 6. सम्राट 7. विराट 8. सार्वभौम।
शुक्र ने नैतिक आधार को भी वर्गीकरण में प्रमुखता देते हुऐ कहा है कि राजा की आय प्रजा को पीड़ा दिए बिना होनी चाहिए तथा यह केवल राजतन्त्र से सम्बन्धित वर्गीकरण ही है।
(४) अभिषेक के प्रसंग में दो प्रकार के राजा :- प्राचीन भारत में राज्याभिषेक संस्कार का विशेष महत्व था और इसके द्वारा ही राजा सत्ता का वैध अधिकारी माना जाता था। शुक्र ने इस परम्परा के प्रतिकूल अनभिषिक्त राजा का भी उल्लेख किया है।
(५) राजा के गुण एवं दुर्गुण :- शुक्र ने राजा के लिऐ ऐसे व्यावहारिक व मानवीय गुणों से सम्पन्न होना आवश्यक माना है, जिनके द्वारा व्यापक दायित्वों का उचित प्रकार से निर्वाह कर सके तथा सार्वजनिक प्र्रशंसा का पात्र बना रहे। शुक्र का मत है कि राजा को सर्वप्रथम अपने ऊपर ही विजय पानी चाहिए। राजा के गुणों के अनुसार ही उसके सहायकों के गुण भी हो जाते है। अतः सदैव राजा को गुणवान होने का आदर्श ही प्रस्तुत करना चाहिए। राजा केवल राजकुल में उत्पन्न होने के कारण ही प्रजा का आदर प्राप्त नहीं करता अपितु उसके गुण ही उसे आदर प्रदान करते है।
(६) राजा की दिनचर्या :- शुक्रनीति में भी मनुस्मृति और अर्थशास्त्र के समान ही राजा को यह परामर्श दिया गया है कि वह अपनी दिनचर्या का उचित विभाजन करके दिन के विशिष्ट कालखण्ड में निर्धारित कार्य करे। शुक्र नीति में राजा की 24 घण्टे की दिनचर्या को 30 मुहूर्तो में विभाजित किया गया है। शुक्र का एक मुहूर्त 48 मिनट के बराबर है। शुक्र ने राजा को परामर्श दिया कि कार्यों को नियत समय पर करने से बहुत सुख मिलता है अन्यथा हानि होती है।
(७) उत्तराधिकार का सिद्धान्त :- शुक्र ने प्राचीन परम्परा का अनुकरण करते हुए उत्तराधिकार के बारे मे 4 सिद्धान्तों को स्वीकार किया है -
1. पैतृक सिद्धान्त 2. ज्येष्ठता सिद्धान्त 3. शारिरिक परिपूर्णता सिद्धान्त 4. योग्यता सिद्धान्त।
शुक्र ने यह प्रतिपादित किया है कि शासन का उत्तराधिकारी राजकुल में से ही लिया जाना चाहिए, किन्तु राजा के ज्येष्ठ पुत्र को स्वतः ही शासन का उत्तराधिकारी नहीं मान लेना चाहिए। राजा के जीवित रहते हुए ही उत्तराधिकार के प्रश्न को निश्चित करना अच्छा है। अनेक व्यक्तियों के स्थान पर एक व्यक्ति को ही उत्तराधिकारी निश्चित करना चाहिए। शुक्र ने उत्तराधिकार के प्रश्न को हल करने के लिऐ राज्य का विभाजन करने के विचार का दृढ़ता से निषेध किया है क्योकि राज्य विभाजित होने से शत्रु द्वारा नष्ट करने की आशंका रहती है। उत्तराधिकार के दावेदारों में ऐसे मतभेद भी हो सकते हैं जो राज्य एवं राजकुल के लिऐ विनाश का कारण बन सकते हैं। अतः इन सभी के राजसी मान-सम्मान के जीवन का प्रबन्ध किया जाए, ताकि ये संतुष्ट रह सकें।[
निरंकुश राजा पर नियंत्रण
शुक्रनीति में शासक को व्यापक शक्तियाँ प्रदान की गई है, परन्तु शासक से इनका प्रयोग विधि एवं धर्म के अनुसार करने की अपेक्षा की गई है। शुक्र ने राजाओं को निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी बनाने से रोकने के लिऐ तीन उपाय सुझाए है -
(१) नैतिक उपाय :- शुक्रनीति में राजा से नीति का पालन करने की अपेक्षा की गई है तथा उसके स्वेच्छाचारी व्यवहार का निषेध किया गया है। शासक को दण्ड की शक्ति के प्रयोग का अधिकार उसी स्थिति में प्राप्त है जबकि वह स्वयं अपने धर्म के पालन के प्रति निष्ठावान हो तथा उसका स्वयं का आचरण दोषरहित हो। शुक्र ने शासक से निजी व सार्वजनिक दोनों प्रकार के आचरणों में शुद्धता और मर्यादा की अपेक्षा करते हुए उसे परामर्श दिया है कि इस बात को समझकर कि यौवन, जीवन, धन व प्रभुत्व चिरस्थायी नहीं होते उसे धर्म में ही निरत रहना चाहिए। शुक्र का मत है कि यदि शासक में एक भी दुर्गुण हो तो जनता के मध्य उसकी छवि बिगड़ भी सकती है। शुक्र ने शासक को यह भी परामर्श दिया है कि वह अपनी प्रजा को वश में करने के लिए भेदभाव का नहीं अपितु साम व दान का प्रयोग करें।
शुक्र ने शासक से परम्पराओं, प्रतिष्ठित सामाजिक मूल्यों आदि का नियन्त्रण मानने की अपेक्षा की है। शुक्रनीति सार द्वारा सुझाए गए नैतिक उपायों में राजा की शिक्षा, नीति व दर्शन के उपदेश, राजा के सहायकों एवं परामर्शदाताओं द्वारा प्रस्तुत दृष्टान्त पारलौकिक सुखों एवं दुखों की व्यवस्था, राजा के विभिन्न कर्त्तव्य, राजा की दिनचर्या आदि को शामिल किया जा सकता है।
(२) वैधानिक उपाय :- शुक्र के अनुसार राजा का पद श्रेष्ठ अवश्य है, किन्तु यह विधि, नियम एवं कानून से अधिक श्रेष्ठ नहीं है। शुक्र के अनुसार राजा को केवल परम्परागत विधि (सदाचार एवं रूढ़ियाँ) में ही परिवर्तन करने का अधिकार है, किंतु यह परिवर्तन देश, काल, स्थिति को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए और इस कार्य को ‘पंडित’ नामक मन्त्री की सलाह के आधार पर ही किया जाना चाहिए, जो विधि निर्माण का विशेषज्ञ होता है। शुक्र द्वारा विधि के क्षेत्र में राजा की शक्तियों की जो सीमा बताई गई है, उनसे प्रतीत होता है कि राजा प्रायः विधि के क्षेत्र में निरंकुश नहीं हो पाता था।
प्रशासनिक क्षेत्र में शासन की प्रकृतियों का उचित परामर्श राजा को नीतिभ्रष्ट होने से बचाने के लिए आवश्यक माना गया है। शुक्र ने राज्य के सुचारू संचालन के लिए मन्त्रियों आदि के परामर्श के प्रति शासक की निष्ठा की आवश्यकता को प्रतिपादित किया है, साथ ही परामर्श देने के लिए नियुक्त पदाधिकारियों से यह अपेक्षा की है कि वे राजा को सदैव उचित परामर्श दें। यहाँ तक कि आपातकाल में भी राजा को स्वतंत्र नहीं माना है। वह सम्बन्धित पक्षों की सहमति से ही कठोर निर्णय लेने में समर्थ होता है।
न्यायायिक क्षेत्र में उदासीनता के व्यवहार को शासक के घोर नैतिक अपराध की संज्ञा दी है, तथा चेतावनी दी है कि ऐसा करने पर वह नरक में जाएगा। न्यायिक मुकदमों के निर्णयों के लिए एक निश्चित एवं निष्प्क्ष प्रक्रिया का उल्लेख किया है, जिसका राजा द्वारा पालन किया जाना है। शुक्र ने न्याय सभा के सदस्यों की योग्यता व न्याय साधनों का विस्तृत विवरण दिया है।
(३) विधानेतर उपाय :- शुक्र ने जनता व जनमत के नियंत्रण को भी महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। शुक्र ने शासक को यह परामर्श दिया है कि प्रजा द्वारा की गई अपनी निन्दा को गम्भीरता से ग्रहण करे व अपने दुर्गुणों का निवारण कर शुक्रनीति में शासक को पदच्युत करने के प्रजा के अधिकार को स्पष्टतः मान्यता प्रदान की गई है तथा प्रजा का यह कर्तव्य माना गया है कि वह नीति एवं धर्म के विरूद्ध आचरण करने वाले राजा को निरन्तर भयभीत रखने का प्रयत्न करे तथा ऐसा न हो सकने पर उसे पदच्युत कर दे।]
(क) पुरोहित की मदद से सत्ता में परिवर्तन :- यदि राजा गुण, नीति, सेना का शत्रु हो और अधार्मिक हो तो उसे राष्ट्र का विनाश करने वाला मान कर त्याग दिया जाना चाहिए अर्थात् उसे पद से हटा देना चाहिए। पुरोहित को अन्य प्रकृतियों (मन्त्रि परिषद् के सदस्य) की सहमति से उसे पदच्युत राजा के स्थान पर उसी राजकुल के किसी गुणवान पुरूष को राजपद पर नियुक्त किया जाना चाहिए।
(ख) धर्मशील शत्रु राजा की मदद से सत्ता में सुधार :- शुक्र का मत है कि नीतिभ्रष्ट राजा को पुनः नीति-मार्ग पर लाने का कार्य किसी अन्य धर्मशील व शक्तिशाली राजा द्वारा ही किया जा सकता है, जैसे-दलदल में फंसे हाथी को किसी अन्य हाथी द्वारा ही निकाला जा सकता है। शुक्र ने राजा की स्वेच्छाचारिता से बचने के लिए प्रजा के इस विधानेतर प्रयत्न का समर्थन किया है कि वह अपने राजा के नियन्त्रण के लिए उसके धर्मशील व शक्तिशाली शत्रु राजा से सांठ-गांठ कर सकती है।
उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि शुक्र ने अधर्मशील, स्वेच्छाचारी तथा राष्ट्र का विनाश करने वाले राजा के विरोध को उचित माना है और उसके नियन्त्रण के लिए विभिन्न नैतिक उपायों व वैधानिक उपायों के साथ ही विधानेतर उपायों पर भी विचार किया है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी दुष्ट राजा को साक्षात् कलियुग मानते हुए, उसके वध को उचित माना है। यह उल्लेखनीय है कि शुक्र ने दुष्ट व स्वेच्छाचारी राजा के नियन्त्रण अथवा उसकी पद-मुक्ति की व्यवस्था स्वीकारी है और उसके वध का समर्थन नहीं किया है।