kahani ! kahaniyan ! hindi kahani राज्य के कार्य क्षेत्र

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राज्य का कार्य क्षेत्र

शुक्रनीति में राज्य के कार्य क्षेत्र को अत्यंत व्यापक बताया गया है। शुक्र ने राज्य के कर्त्तव्यों के 8 प्रमुख क्षेत्रों का उल्लेख किया है-

दुष्टों का निग्रह, प्रजा की सुरक्षा, दान, प्रजा का परिपालन, न्यायपूर्वक कोष का अर्जन, राजाओं से कर वसूल करना, शत्रुओं का मान-मर्दन तथा निरन्तर भूमि का अर्जन करना।

राज्य के दायित्वों की इस सूची से यह स्पष्ट है कि शुक्र ने राज्य के विस्तृत कार्यक्षेत्र का प्रतिपादन किया है। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि राज्य को अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए आवश्यक साधन भी अर्जित करने चाहिए। शुक्र ने राज्य के कार्यक्षेत्र में निम्नलिखित प्रमुख कार्य सम्मिलित किए हैं :-

(1) प्रजा एवं राजनीतिक समाज की रक्षा करना :- राज्य का यह सर्वाधिक महत्पूर्ण कार्य है - बाहरी एवं आंतरिक शत्रुओं से प्रजा की रक्षा करना। आंतरिक शांति व्यवस्था को बनाये रखने की दृष्टि से शुक्र ने राजा को निर्देशित किया है कि वह दुष्टों एवं आक्रमण करने वालों से सज्जनों की रक्षा करे। शुक्रनीति सार ने राजधानी प्रशासन तथा ग्राम-प्रशासन के वर्णन में भी आंतरिक शांति एवं व्यवस्था को बनाए रखने पर जोर दिया है और राज्य द्वारा विभिन्न मार्गों को डाकुओं व उपद्रवियों से सुरक्षित रखने की आवश्यकता को स्वीकारा है। शुक्र के अनुसार, इस दायित्व के पालन में उदासीनता के कारण प्रजा में शासन के प्रति विरोध का भाव पनपने लगता है।

(2) लोक कल्याण :- शुक्र ने राज्य की अहस्तक्षेपवादी धारणा के विपरीत, राज्य के लोक कल्याणकारी स्वरूप का प्रतिपादन किया है।

(क) राजा स्वंय के सुख के लिए प्रजा को कष्ट नहीं पहुंचाए क्योकि प्रजा के दुःखी रहने से राजा नष्ट हो सकता है।

(ख) सभी विद्याओं, विज्ञानो व कलाओं का विकास, विद्वानों का सम्मान।

(ग) प्रजा में धर्म की वृद्धि के उपाय करना, देवालय बनवाना।

(घ) कुएँ, तालाब, बावड़ी का निर्माण कराना, नदियों पर पुल बनवाना, सराय बनवाना, वृक्ष लगवाना, पर्यावरण की रक्षा करना।

(च) कृषि, व्यापार की उन्नति करना।

(3) अर्थव्यवस्था का नियंत्रण :- अर्थव्यवस्था का नियंत्रण शुक्र के अनुसार राज्य का आवश्यक दायित्व है। शुक्र ने अनुज्ञा (लाइसेंस) के बिना द्युत क्रीड़ा, शिकार करने व शस्त्र धारण करने का निषेध किया है। शुक्र नीति में व्यवसाय व वाणिज्य के संदर्भ में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए राज्य के पूर्ण नियंत्रण को स्वीकार किया है। शुक्र ने विभिन्न पदार्थो के उत्पादन, विक्रय, चिकित्सा आदि व्यवसायों का विनियमन करने की अपेक्षा की है। व्यापारी पदार्थों में किसी प्रकार की मिलावट न करें, इसका भी निर्देश दिया है। यदि राजकीय आदेशों का उल्लंघन किया जाए तो पक्षपात रहित होकर दण्ड देने के लिए राजा को तत्पर रहना चाहिए। राजमार्गो की मरम्मत करवाना व यात्रियों के माल की रक्षा करना भी राज्य का दायित्व है।

शुक्र के अनुसार, सेना एवं राष्ट्र की रक्षा एवं समृद्धि के लिए कोष का आधारभूत महत्व है। किंतु राजा को कोष का अन्यायपूर्वक संग्रह नहीं करना चाहिए। यदि राजा संकटकाल का मुकाबला करने के लिए प्रजा से अधिक धन वसूल करे तो संकटकाल की समाप्ति पर प्रजा को ब्याज सहित धन वापिस करना चाहिए।

(4) राज्य के सामाजिक दायित्व :- सामाजिक व्यवस्था का नियमन और सामाजिक जीवन में धर्म और नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा करना शु़क्र के अनुसार राजा को शक्ति पूर्वक प्रजा से वर्ण-धर्म का पालन कराना चाहिए। किंतु इसके साथ ही शुक्र ने बताया कि इस संसार में जन्म से ही कोई भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, म्लेच्छ नहीं होता है, वरन् अपने गुणों के आाधार पर ही मनुष्यों में यह भेद किया जाता है। मनुष्यों द्वारा विभिन्न कलाओं व विद्याओं को अपनाने से ही अनेक जातियों का विकास हुआ है। श्रेष्ठता कुल या जाति से नहीं प्राप्त होती वरन् गुणों से ही प्राप्त होती है। जब राजा व प्रजा अपने-अपने धर्म व नीति का पालन करते है तब राज्य चिरस्थायी होता है। शुक्र का राज्य सामाजिक नैतिकता का संरक्षक है, राजा के गुणों का ही प्रजा अनुकरण करती है।

(5) राज्य का शैक्षणिक दायित्व :- राज्य ही शिक्षा के प्रसार के लिए उत्तरदायी है, योग्य विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देना राज्य का ही दायित्व है। विद्या और कला की उन्नति राज्य की ही जिम्मेदारी है। योग्य, बुद्धिमान व्यक्तियों के सम्मान व भरण-पोषण की व्यवस्था भी राज्य का दायित्व है।

(6) विधि एवं न्याय व्यवस्था :- शुक्र ने कौटिल्य के समान ही अन्य विधिस्रोतों के अतिरिक्त राजाज्ञा को भी विधि का स्रोत माना है। शुक्र ने ‘पंडित’ नामक मंत्री का उल्लेख किया है, जो विधि विशेषज्ञ है। यह राजा का प्रमुख कर्त्तव्य है कि वह मुकदमों का उचित प्रकार से निर्णय करे और अपने आदेशों का पालन कराए। राजा को न्यायकार्य द्वारा दुष्टों का दमन करना चाहिए। लेकिन यदि राजा अपने न्याय कार्य की उपेक्षा करता है तो शुक्रनीति के अनुसार उसे घोर कष्ट सहन करने पड़ते है।

(7) प्रशासनिक व्यवस्था का कुशल संचालन :- शुक्रनीति में न केवल प्रशासन के सन्दर्भ में विभागीय एवं कार्यालय पद्धति का उल्लेख किया गया है वरन् प्रशासन को लिखित आदेशों पर भी आधारित किया है। राज्य के दायित्वों को पूरा करने हेतु, एक सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है। शासन को निरंतर सजग रहते हुए यह देखना चाहिए कि प्रशासनिक अधिकारी व कर्मचारी अपने दायित्वों का भली प्रकार पालन करते रहें एवं प्रजा को पीड़ित न करें। इसके साथ ही कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखना भी राज्य का ही दायित्व है। शुक्र ऐसे प्रथम भारतीय विचारक हैं, जिन्होंने प्रशासन के आंतरिक पक्षों का भी विस्तृत विवरण दिया है।

(8) परराष्ट्र सम्बन्ध :- शुक्र ने राज्य से अपेक्षा की है कि वह पर राष्ट्र सम्बन्धों के संचालन में जनहित एवं सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रहित का भी ध्यान रखे। राज्य को अनावश्यक युद्धों व टकराव से बचाए। विदेश नीति के संचालन के लिए शुक्र व कौटिल्य के समान ही शासक के लिए कुछ सिद्धान्त व नियम निर्धारित किए है। नीति के चार उपाय एवं षड्गुण मंत्र इसमें प्रमुख है। राज्यों के मध्य संबंधों में ‘शक्ति‘ के महत्व का प्रतिपादन करके शुक्र ने यथार्थवादी दृष्टि अपनाई है। राजा को विदेशनीति का संचालन इस प्रकार करना चाहिए कि अन्य राज्य उससे अधिक शक्तिशाली न हो जाएँ। शुक्र ने शांतिवादी नीति अपनाते हुऐ कहा है कि अन्य उपाय असफल होने पर ही युद्ध या दण्ड को अपनाना चाहिए शुक्र ने पराजित राजा के प्रति जिस प्रकार के व्यवहार का उल्लेख किया है, उससे उसकी मानवतावादी दृष्टि का ज्ञान होता है।

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