kahani ! kahaniyan ! hindi kahani मन्त्रिपरिषद और प्रशासनिक संगठन
मन्त्रिपरिषद
शुक्रनीति सार के अनुसार सभी विद्याओं में अति कुशल राजा के लिए भी राजकार्य जैसे अतिकठिन कार्य को अकेले ही करना असम्भव होता है। अतः राजा को अपने सहायकों से परामर्श करना चाहिए। शुक्र के अनुसार जो राजा मन्त्री के मुंह से कही गयी हित-अहित की बातों पर गौर नहीं करता है वह राजा होकर भी वास्तव में डाकू के समान केवल प्रजा के धन को लूटने वाला ही होता है।
मंन्त्रिपरिषद का संगठन
शुक्र ने मंन्त्रि परिषद के सदस्यों के लिए ‘प्रकृति‘ शब्द का प्रयोग किया है।
(क) सदस्य संख्या :- जहां अन्य आचार्यो ने यह संख्या 8 स्वीकारी है। शुक्र ने इनकी सहायता के लिए दस ‘सहायकों‘ की भी व्यवस्था की है। जिन्हें अल्टेकर ने ‘उपमंन्त्री‘ कहा है।
(ख) विभिन्न विभाग, मन्त्रियों के पद तथा उनका वरीयताक्रम :- शुक्रनीतिसार के सदस्यों के पद, विभाग एवं वरीयता क्रम को निम्नलिखित प्रकार से प्रकट किया गया है -
1. पुरोधा (पुरोहित) 2. प्रतिनिधि 3. प्रधान 4. सचिव
5. मन्त्री 6. प्राड्विवाक 7. पण्डित 8. सुमंत्र 9 अमात्य 10. दूत।
(ग) वेतन :- शुक्र ने इस वेतन सिद्धान्त को स्वीकार किया है कि पुरोधा से आरम्भ करके पूर्व पद का वेतन आगामी पद से 1/10 ज्यादा होना चाहिए। इससे स्पष्ट होता है कि शुक्र ने वेतन के बारे में पद एवं विभागों के वरीयता क्रम को महत्व प्रदान किया है।
(द) कार्यकाल तथा विभाग परिवर्तन :- किसी भी पद पर किसी भी मन्त्री को स्थायी रूप से नियुक्त नहीं करना चाहिए, इनकी योग्यता की निरन्तर जांच करते हुऐ, कार्यकुशलता के अनुसार पदों में परिवर्तन करते रहना चाहिए। यदि किसी विभाग का प्रधान अधिकारी अयोग्य सिद्ध हो तो उसके स्थान पर उसके किसी योग्य सहायक को नियुक्त किया जाना चाहिए।
मन्त्रिपरिषद के सदस्यों की योग्यता एवं कार्यानुसार विवरण
(क) सदस्यों की समान योग्यता :- शुक्र ने नियुक्ति सम्बंधी विवरण में अग्रलिखित छः प्रकार की योग्यता पर बल दिया है -
1. आनुवांशिकता 2. नैतिकता 3. शारीरिक क्षमता
4. बौद्धिक क्षमता 5. राजभक्ति 6. नीतिनिपुणता
अल्टेकर के अनुसार, ‘‘शुक्र का मत है कि केवल भोजन व विवाह के अवसरों पर ही जाति की पूछताछ की जानी चाहिए, मन्त्रिपरिषद में नियुक्ति के समय नहीं। शुक्र को शूद्र के अधीन सैन्य विभाग रखने में कोई आपत्ति नहीं है, यदि वह योग्य एवं राजभक्त हो।‘‘ वास्तव में शुक्र का मत प्राचीन भारत की उदार परम्परा के अनुरूप है। शान्तिपर्व ने मन्त्रिपरिषद में प्रथम तीन वर्णों के अलावा तीन योग्य शूद्रों की नियुक्ति का स्पष्ट उल्लेख किया है।
(ख) सदस्यों की विशिष्ट योग्यता एवं कार्य :-
शुक्र की मन्त्रि परिषद
सर्वप्रथम स्थान पुरोधा का है। उसे मन्त्र, कर्मकाण्ड, त्रयी, छह वेदांग, धनुर्वेद, नीतिविद्या आदि का ज्ञाता होना चाहिए। उसे काम, क्रोध, लोभ मोह से रहित, इन्द्रियजयी और धार्मिक जीवन में रत होना चाहिए।
प्रतिनिधि को इतना योग्य होना चाहिऐ कि वह देश, काल व स्थान के सन्दर्भ में करने योग्य एवं न करने योग्य कार्यो की पहचान रखता हो।
मन्त्रिपरिषद का तीसरा सदस्य प्रधान है, जो शासन के सभी कार्यों का सामान्य निरीक्षण करने की योग्यता रखता है।
चौथा सदस्य सचिव है, जो अपने कार्यों की दृष्टि से युद्ध मन्त्री है। वह सेना एवं इसके कार्यों का समस्त ज्ञान रखता है।
पांचवा सदस्य मन्त्री का है, जिसे आधुनिक दृष्टि से विदेश मन्त्री या परराष्ट्र मन्त्री कह सकते है।
छठा सदस्य प्राड्विवाक है, जो प्रधान न्यायाधीश है एवं न्याय विभाग का प्रमुख राजनीतिक अधिकारी भी है। उसे शास्त्रोक्त एवं लोक प्रचलित आचार का ज्ञाता होना चाहिए।
सातवां सदस्य पण्डित, धर्म के तत्व का ज्ञाता होना चाहिए।
आठवें सदस्य सुमंत्र को शुक्र का वित्त मन्त्री या कोषाध्यक्ष कहा जा सकता है, जिसे आय-व्यय की सम्पूर्ण जानकारी होनी चाहिए।
नवां सदस्य अमात्य देश तथा आलेखों का ज्ञाता होना चाहिए। वह राज्य में स्थित नगरों, ग्रामों, जंगलों की भूमि की माप का हिसाब रखता है और इनसे होने वाली आय का भी विवरण रखता है।
वरीयता क्रम में अन्तिम स्थान दूत का है। वह षाड्गुण्यमन्त्र का ज्ञाता, अच्छा वक्ता, निर्भीक, देश व काल की स्थिति को समझने वाला होना चाहिए।
मन्त्रिपरिषद की लिखित कार्य-प्रणाली
प्राचीन भारतीय राजनीतिक ग्रंथों मे केवल शुक्रनीतिसार में ही मंन्त्रिपरिषद की कार्यप्रणाली पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। इस ग्रन्थ में मन्त्रि परिषद की कार्य प्रणाली के बारे में अग्रलिखित तथ्यों को स्पष्ट किया है -
(1) मन्त्रिपरिषद का सदस्य एवं सहायक मिलकर अपने विभाग से सम्बन्धित किसी विषय पर एक लेख तैयार करते है।
(2) इस लेख पर सर्वप्रथम राजा की टिप्पणी द्वारा इसके दोषों को समाप्त किया जाता है।
(3) इसके बाद सभी मन्त्रियों की सलाह ली जाती है, जिससे सभी विभागों में ताल-मेल एवं सहयोग बना रहता है।
(4) इस लेख पर सभी मन्त्रियों द्वारा अपनी मुद्रा सहित हस्ताक्षर किए जाते है।
(5) अन्त में पुनः राजा अवलोकन करता है और अपना अन्तिम निर्णय देता है। इस प्रकार यह प्रक्रिया राज्य के लिए लाभदायक है क्योंकि राजा लिखित रूप में सबकी राय भी जान लेता है एवं अन्तिम निर्णय का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखता है।
राष्ट्र का प्रशासन एवं कार्मिक व्यवस्था
शुक्र ने दो प्रकार के प्रशासन का उल्लेख किया है- केन्द्रीय प्रशासन एवं स्थानीय प्रशासन। केन्द्रीय प्रशासन में राजभृत्यों के महत्व को बताते हुए शुक्र ने राजा को परामर्श दिया है कि वह राज्य की उन्नति के लिए अनेक ज्ञानवान एवं गुणी सहायकों की नियुक्ति करे। शुक्र ने सात प्रकार के सेवकों का उल्लेख किया है और सभी वर्गों के अधिकारियों, सहायकों एवं सेवकों की नियुक्ति सम्बन्धी योग्यता पर विस्तार से प्रकाश डाला है। शुक्र ने स्थानीय प्रशासन के संगठन का भी उल्लेख किया है, जिसमें अग्रलिखित 6 अधिकारियों का उल्लेख है -
साहसाधिपति, ग्राम नेता, भागहार, लेखक, शुल्क ग्राहक तथा प्रतिहारी।
शासकीय अधिकारियों पर नियंन्त्रण
कुशल प्रशासन हेतु अनिवार्य है कि राजा अधिकारियों के कार्यों पर कड़ी नजर रखे। शुक्रनीति में कहा गया है कि यदि सौ प्रजाजन किसी अधिकारी के विरूद्ध आवेदन पत्र दे दें, तो उस अधिकारी को पदच्युत कर देना चाहिए। शुक्र ने परामर्श दिया है कि राजा अन्याय करने वाले अधिकारियों से उनकी शक्तियाँ छीन ले। नियन्त्रण के लिए यह भी अनिवार्य है कि एक पद पर एक व्यक्ति अधिक समय तक न रहे। किसी व्यक्ति की पद पर नियुक्ति केवल योग्यता के आधार पर करनी चाहिए
प्रशासनिक संगठन
शुक्रनीति में प्रशासन के 20 विभागों का उल्लेख किया गया है- गज, अश्व, स्वर्ण, रजत विभाग आदि। इन विभागों के अध्यक्ष पद को सामान्य रूप से कर्म सचिव कहा है, किन्तु इसके साथ ही अध्यक्ष पद के लिऐ अध्यक्ष, पति या अधिपति की संज्ञा का प्रयोग किया है। शुक्रनीति में प्रतिपादित प्रशासनिक संगठन बहुस्तरीय है। प्रशासन के केन्द्रीय स्तर पर संगठित विभागों के अतिरिक्त, शुक्र ने स्थानीय, ग्रामीण और नगरीय प्रशासन की संगठनात्मक संरचना पर प्रकाश डाला है। शुक्र का मत है कि प्रत्येक ग्राम और प्रत्येक नगर में साहसाध्यक्ष (पुलिस अधीक्षक के समकक्ष पद) ग्राम का अध्यक्ष भागहार (प्रजा से कर वसूलने हेतु उत्तरदायी) की नियुक्ति की जानी चाहिए।
प्रशासन के समस्त स्तरों पर नियुक्त कार्मिकों की व्यावसायिक व तकनीकी योग्यताओं का शुक्र नीति में विस्तार से उल्लेख किया गया है।
प्रशासन की कार्यालय पद्धति
शुक्र ने प्रशासन की कार्यालय पद्धति में लिखित आदेश को अत्यधिक महत्व दिया है। उनके अनुसार, अधिकारी या सहायकों को बिना लिखित राजाज्ञा के कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि राजा की राजमुद्रा व हस्ताक्षर युक्त लिखित आदेश ही वास्तविक राजा होता है, व्यक्ति राजा नहीं होता है। शुक्र ने राजा के लिखित आदेश को स्मृति पत्र (फाइल) के रूप में सुरक्षित रखने की प्रणाली को स्वीकार किया गया है। इसके साथ ही उन्होंने प्रशासन में दैनिक, मासिक, वार्षिक तथा बहुवर्षीय रिपोर्ट तैयार करने पर भी बल दिया गया है। प्रशासन के कुशल संचालन के लिये शुक्र ने सूचनाओं की प्रतिदिन प्राप्ति पर जोर दिया है। उनका मत है कि राजा को प्रतिदिन 100 कोस दूर तक के प्रदेशों की सूचनाऐं प्राप्त होनी चाहिए। शुक्र ने राजकीय कार्यालयों की सुरक्षा के लिए पहरेदारों व रक्षकों की व्यवस्था को स्वीकार किया है।
प्रशासन में कार्मिक व्यवस्था
कार्मिक व्यवस्था के विवेचन की दृष्टि से शुक्रनीति को विलक्षण ग्रन्थ माना जा सकता है, क्योकि कार्मिक व्यवस्था के विभिन्न पक्षों का जैसा सटीक, व्यवस्थित व पूर्ण चित्रण इसमें उपलब्ध है, वह कहीं नहीं मिलता है।
(१) राज्य कर्मचारियों के लिऐ आचार संहिता : समस्त राजकर्मचारियों से आचरण के सामान्य नियमों के पालन की अपेक्षा की गई है। इन नियमों या आचार संहिता का पालन करने वाले कर्मचारियों को ग्रन्थ में श्रेष्ठ कार्मिक बताया गया है। शुक्र के अनुसार, भृत्य को स्वामी के प्रति तथा अपने सेवा कार्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित होकर कार्य करना चाहिए। उसे शिष्टतापूर्वक राजा को सद्कार्य की प्रेरणा देनी चाहिए तथा कभी भी मात्र चाटुकारिता नहीं करनी चाहिए। कर्मचारियों को कभी भी प्रजा से झूठे वादे नहीं करने चाहिए। अनुचित कार्यों जैसे- रिश्वत, जुआ, क्रोध, दुश्चरित्रता आदि को त्याग देना चाहिए। उपर्युक्त गुणों के विपरीत कार्य करने वालों को शुक्र ने निकृष्ट माना है।
(२) वेतन, वेतनमान व वेतनवृद्धि : वेतन भुगतान के सिद्धान्त में कार्य व काल दोनों को ही आधार बनाया गया है अर्थात् एक निश्चित काल में किए गये कार्य की मात्रा देखकर ही भृत्ति दी जाती है। शुक्र ने राजा को यह परामर्श दिया है कि वह वेतन में कटौती नहीं करे और सदैव नियत समय पर ही वेतन दे। शुक्रनीति में स्पष्ट प्रतिपादित किया गया है कि कार्मिक का न्यूनतम वेतन इतना होना चाहिए कि उस पर आश्रित व्यक्तियों का सरलता से भरण-पोषण हो सक। वेतनमानों को श्रेष्ठ, मध्यम, सम व हीन में विभाजित किया गया है। शुक्र ने राजा को चेतावनी दी है कि अत्यन्त कम वेतन प्राप्त करने वाले कर्मचारी शासन से असंतुष्ट हो जाते है और राजकीय कार्यो की अपेक्षा अन्य कार्यों में रूचि लेने लगते है। अतः जैसे-जैसे भृत्य की योग्यता में वृद्धि हो, वैसे-वैसे उसके वेतन में भी वृद्धि होनी चाहिए, क्योंकि इससे अन्त में स्वयं राजा का हित होता है।
(३) सेवा अवधि, पदोन्नति एवं पद अवनति : सामान्य स्थिति में एक कर्मचारी की सेवा अवधि- 40 वर्ष स्वीकार की है, किन्तु इसके साथ ही भृत्यों की सदैव परीक्षा होती रहनी चाहिए और अवगुण उत्पन्न हो जाने पर भृत्य को पद मुक्त कर देना चाहिए।
शुक्रनीति में कर्मचारियों की समयबद्ध पदोन्नति के बारे में स्पष्ट प्रावधान किया गया है, जब कोई कार्मिक अपने अनुभव के आधार पर अपने पद से श्रेष्ठ होता जाए तो उसे उत्तरोतर श्रेष्ठ पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए। इसके विपरीत यदि कोई प्रधान सेवक आलस्य आदि के कारण अपने दायित्वों की उपेक्षा करता है तो उसे अप्रधान सेवक बना देना चाहिए।
(४) शुक्र ने भृत्यों के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की है।
(५) पेंशन, क्षतिपूर्ति, भविष्य निधि व बोनस की व्यवस्था : राजसेवा में 40 वर्ष पूरे करने के उपरांत, सेवानिवृत्ति के बाद पेन्शन रूप में पैसा आजीवन दिया जाना चाहिए। केवल पेंशन ही नहीं पारिवारिक पेंशन की व्यवस्था भी है। राज कर्मचारियों के लिए भविष्य निधि की योजना को भी स्वीकार किया हैं। राजा को कार्मिक के वेतन की कुल राशि का 1/6 या 1/4 भाग काटकर अपने यहां जमा कर लेना चाहिए और दो या तीन वर्ष बाद, उस जमा राशि के आधे या पूरे भाग का भुगतान कार्मिक को कर देना चाहिए।
(६) विश्राम एवं अवकाश के नियम : नियमित कार्मिकों के प्रतिदिन 12 घण्टे राजकार्य की व्यवस्था है। कर्मचारियों को उपयुक्त अन्तराल पर तथा विशिष्ट परिस्थितियों में कार्य से अवकाश प्रदान किये जाने की आवश्यकता व्यक्त की गई है एवं विस्तृत नियमों का प्रतिपादन किया गया है। उत्सव आदि के दिन कोई कार्य कर्मचारियों से नहीं कराया जायेगा। यदि कोई अधिक आवश्यक कार्य हो तो उत्सव वाले दिन भी कराने की व्यवस्था की गई है, परन्तु श्राद्ध के दिन किसी भी प्रकार के कार्य का स्पष्ट निषेध किया गया है। कार्मिकों को प्रतिदिन निश्चित अन्तराल पर अवकाश देने की व्यवस्था भी की गई है। कर्मचारियों के अस्वस्थ हो जाने पर उन्हें ‘सवेतन‘ व अर्द्धवेतन अवकाश की व्यवस्था की गई है। प्रतिवर्ष 15 दिन के सवेतन अवकाश के साथ स्वास्थ्य अवकाश की भी व्यवस्था की है। किन्तु जब कोई योग्य भृत्य बीमार हो जाए, उसकी बीमारी की अवधि की उपेक्षा करके उसे सदैव आधा वेतन अवश्य ही दिया जाना चाहिए।
इस प्रकार शुक्रनीति प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन का ऐसा ग्रन्थ है। जिसमें कार्मिक व्यवस्था का इतना विस्तृत व व्यापक विवरण दिया गया है, तथा जो कर्मचारियों के हितों पर आधारित है।