kahani ! kahaniyan ! hindi kahani नीति के उपाय

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नीति के उपाय

शुक्र ने परराष्ट्र नीति के संचालन में राजहित एवं शक्ति तत्व को पर्याप्त महत्व दिया है। उनके अनुसार प्रत्येक राजा अपने राजहित को ही साध्य मानता है और जब विजिगीषु राजा अन्य राज्यों के सन्दर्भ में अपनी शक्ति के अनुसार नीति के उपायों एवं षड्गुण मंत्र के साधनों का कुशलतम प्रयोग करता हैं तो उसे सफलता मिलती है। शुक्र के अनुसार, जिस प्रकार राजा द्वारा सर्प, हाथी तथा सिंह को अपने वश में किया जाता है, उसी प्रकार से राजा को यथायोग्य उपायों से मित्र तथा शत्रु को अपना वशवर्ती बनाना चाहिए। शुक्र ने नीति के चार परम्परागत उपायों का ही उल्लेख किया है -

(1) साम (2) दान (3) भेद (4) दण्ड।

साम नीति का प्रयोग, मित्र व शत्रु दोनों के विरूद्ध ही किया जा सकता है। शांति व मैत्री की नीति से जहां मित्रता अधिक मजबूत होती है। वहीं शत्रु राजा के प्रति भी सहायता व सहयोग निश्चित होता है। शत्रु के प्रति सामनीति का प्रयोग दोनों राज्यों की आपसी सुरक्षा में अभिवृद्धि करना है।

दान नीति का प्रयोग भी शत्रु व मित्र दोनों के प्रति किया जाता है। मित्र राजा से यह कहना कि मेरी सभी वस्तुएँ, यहाँ तक कि जीवन भी, तुम्हारा है, मित्र के प्रति दान नीति कहलाती हैं। शत्रु राजा को प्रत्यक्ष धन देना उसके प्रति दान नीति कहलाती है।

भेद नीति के प्रयोग को शुक्र ने मित्र के विरूद्ध अनुचित माना है, किन्तु कुछ स्थितियों में उचित भी माना है। शत्रु राजा के प्रति तीन प्रकार से भेद नीति का प्रयोग किया जा सकता है -

(1) शत्रु राजा को सहायकों व साधनो की दृष्टि से कमजोर करना

(2) शत्रु के विरूद्ध अन्य शक्तिशाली राजा का आश्रय लेना

(3) शत्रु से हीन बल वाले राजा का साथ देकर उसे शक्तिशाली बना देना।

इसमें अतिरिक्त भेद के द्वारा शत्रु राजा व उसकी राजभक्त प्रजा के मध्य मतभेद उत्पन्न कराए जा सकते है।

दण्डनीति का प्रयोग भी मित्र व शत्रु दोनों के विरूद्ध किया जा सकता हैं। मित्र राजा को यह चेतावनी देना कि वह यदि मनमाना व्यवहार करेगा तो मैं तुम्हारा मित्र नहीं रहूँगा- दण्ड नीति है। जबकि शत्रु राजा के दोष प्रकट करना, धन नष्ट करना, युद्ध में कष्ट देना उसके प्रति दण्ड नीति है। यद्यापि शुक्र द्वारा मित्र राजाओं के प्रति भेद व दण्ड नीति को अनैतिक कहा जा सकता है, लेकिन यह उनकी यथार्थवादी नीति है। शुक्र के अनुसार राजा को पर्याप्त सोच-विचार कर ही इन चारों नीति उपायों का प्रयोग करना चाहिए। शुक्र ने अत्यन्त प्रबल शत्रु के लिए साम और दान का, अपने से अधिक बलवान के लिए साम और भेद का, अपने बराबर शक्ति वाले के लिए भेद और दण्ड का प्रयोग उचित माना है।

षड्गुण नीति

इसका अर्थ है - 6 गुण वाली विशिष्ट धारणा। यद्यपि कौटिल्य के समान शुक्र ने इन गुणों का विस्तार से विवेचन नहीं किया है। इसके 6 गुण निम्नलिखित हैं-

(1) सन्धि :- शुक्र ने सन्धि को ऐसा साधन माना है, जिसके द्वारा शक्तिशाली शत्रु से हीनबल राजा की मित्रता होती है अर्थात् हीनबल राजा को सुरक्षा प्राप्त होती है। सन्धि के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है, ‘‘जिस प्रकार से घने कांटो से घिरे हुए बांसों के समूह को कोई काट या उखाड़ नहीं सकता है, उसी प्रकार से म्लेच्छों से भी सन्धि किए हुए राजा को भी, कोई पराजित नहीं कर सकता।’’ शुक्र एकमात्र ऐसे प्राचीन आचार्य है, जो अपने हित की पूर्ति के लिए अनार्य राजा से भी सन्धि को भी उचित मानते है।

(2) विग्रह :- विग्रह का अर्थ है - राजाओं के मध्य शान्ति व सहयोग की नीति का अन्त एवं तनाव व संघर्ष का आरम्भ। जिस कार्य द्वारा शत्रु को पीड़ित किया जाए और अधीन किया जाए, उसे विग्रह कहते है। वस्तुतः विग्रह ऐसी नीति है, जिसके द्वारा शक्तिशाली राजा, निर्बल राजा को पीड़ित करके, उसे बिना प्रत्यक्ष युद्ध के ही, अपने अनुसार चलने को विवश करता है। यही कारण है कि बुद्धिमान राजा को सन्धि से बंधे हुए शत्रु का भी विश्वास नहीं करना चाहिए। इन्द्र द्वारा वृत्रासुर-वध का उदाहरण देते हुए शुक्र ने कहा है कि इन्द्र ने द्रोह न करने की प्रतिज्ञा के साथ सन्धि करके भी ऐसा किया था। किन्तु शुक्र ने बलवान शत्रु से विग्रह का निषेध किया है। केवल रक्षा के लिए कोई विकल्प शेष न होने पर ही अन्त में विग्रह को शुक्र ने उचित माना है।

(3) यान :- जब अपने इच्छित हित की प्राप्ति के लिए शत्रु राजा का नाश आवश्यक होता है और इस उद्देश्य से उस पर आक्रमण किया जाता है, तब इसे यान कहते है। यान का नकारात्मक उद्देश्य है, शत्रु का नाश करना। किन्तु सकारात्मक उद्देश्य है, आर्थिक सैनिक, व राजनीतिक लाभ की प्राप्ति। केवल शक्तिशाली राजा को निर्बल राजा के विरूद्ध ही यान का प्रयोग करना चाहिए।

(4) आसन :- जहां अन्य आचार्यो ने आसन का अर्थ - शत्रु राजा के प्रति उपेक्षा तटस्थता एवं निष्क्रियता की नीति माना है। शुक्र ने इसे शत्रु राजा के किले या नगर की ऐसी सैनिक घेराबंदी माना है, जो स्वयं की रक्षा करते हुए शत्रु को अपनी शर्तों पर सम्पर्क के लिए विवश करे। आसन द्वारा शत्रु राजा की रसद पंक्ति नष्ट कर दी जाती है। युद्ध सामग्री एवं भोजन सामग्री ईधन आदि की कमी होने पर शत्रु पक्ष में आन्तरिक असंतोष उत्पन्न होता है। और तब वह शत्रु राजा विवश होकर अधीनता स्वीकार कर लेता है।

(5) आश्रय :- जब किसी शक्तिशाली शत्रु राजा द्वारा निर्बल राजा का राज्य नष्ट कर दिया जाये अथवा ऐसी पराजय का संकट आ जाये तो निर्बल राजा को अपनी रक्षा के लिए किसी अन्य शक्तिशाली राजा का आश्रय लेना चाहिए, जिससे उसकी शक्ति मे वृद्धि हो सके।

(6) द्वैधी भाव :- इसका शाब्दिक अर्थ है एक ही समय में दो भावों का पाया जाना जो प्रकट रूप में दिखाया जाता है। गुप्त रूप में उससे ठीक विपरीत आचरण किया जाता है। प्रकट रूप में मित्रता एवं गुप्त रूप में शत्रुता इसकी विशेषता है। सेना के संचालन में भी द्वैधी भाव का शुक्र ने उल्लेख किया है। सेना को अनेक टुकडियों में बांटकर शत्रु को प्रकट रूप में अपने सैनिक बल के बारे में रखना द्वैधी भाव है।

पर-राष्ट्र सम्बन्धों का व्यावहारिक पक्ष

शुक्र ने व्यावहारिक संचालन की दृष्टि से चार प्रमुख संस्थागत साधनों का उल्लेख किया है -

(1) दूत (2) गुप्तचर (3) सेना (4) युद्ध।

(१) दूत : दूत को शुक्र ने मंत्रिपरिषद के 10 सदस्यों में भी स्थान दिया है। वह कूटनीति एवं विदेशनीति से सम्बन्धित कार्यों को करता है। वह राजा का ऐसा भ्रमणशील प्रतिनिधि है जो अन्य राजाओं से संवाद स्थापित करता है। अतः उसे देश व काल की स्थिति समझाने वाला भाषण कला में कुशल, अन्य की हृदयागत भावना समझने वाला एवं निर्भीक स्वभाव का होना चाहिए।

(२) गुप्तचर : शुक्रनीति में अर्थशास्त्र के समान गुप्तचर की व्यवस्था का व्यापक उल्लेख नहीं किया गया है। गुप्तचर के प्रकारों के विषय में भी शुक्रनीति मौन है, गुप्तचर प्रशासन बाह्य एवं आन्तरिक शत्रुओं से राजा एवं राज्य की रक्षा का प्रमुख साधन है। गुप्तचर का कार्य है- राजा के शत्रु सेवकों व प्रजा के व्यवहार को जानना व उसकी जानकारी राजा को देना। राजा को भी उसकी सत्यता की परीक्षा करते रहना चाहिए तथा असत्यवादी गुप्तचर को दण्डित करना चाहिए।

(३) सेना : शुक्र के अनुसार सेना व्यक्तियों, पशुओं आदि का समूह है, जो अस्त्र, शस्त्र से सुसज्जित होती है। सेना के कारण ही शत्रु का नाश सम्भव होता है तथा कोष, राज्य व पराक्रम की वृद्धि होती है। शुक्र ने सैनिक अनुशासन व आचारसंहिता पर भी विचार किया है। राजा को सदैव ऐसे प्रयत्न करने चाहिए कि उसकी सेना में भेद उत्पन्न न हो जबकि शत्रु सेना में अवश्य ही भेद उत्पन्न हो। युद्ध में विजय प्राप्त होन पर सैनिकों को भी लाभ मिलना चाहिए और उन्हें लूट के माल में भागीदार बनाकर संतुष्ट रखना चाहिए।

(४) युद्ध : शुक्र ने बाह्य चुनौतियों से रक्षा के लिए और अपने राज्य के विस्तार के लिए युद्ध की आवश्यकता को स्वीकार किया है। सभी राजा राज्य विस्तार की कामना रखते है। इसलिए परस्पर शत्रुता भी रखते है। शुक्र के अनुसार जब नीति के विभिन्न उपाय एवं षड्गुण मंत्र से भी सफलता नहीं मिले, तब अन्तिम साधन के रूप में युद्ध को अपनाना चाहिए। शुक्रनीति प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में संभवतः एक मात्र ग्रन्थ है, जिसमें युद्ध को परिभाषित किया गया है। शुक्र के अनुसार, परस्पर शत्रु भाव रखते हुए दो राजाओं का अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग करना युद्ध है। शुक्र ने युद्ध में नैतिक नियमों के पालन एवं उल्लंघन के आधार पर, दो प्रकार के युद्ध का उल्लेख किया गया है। धर्म युद्ध, एवं कूटयुद्ध। शुक्र ने धर्म-युद्ध के नैतिक नियमों का विवरण दिया है। किन्तु उन्होंने मनु की तरह कूटयुद्ध पर धर्म युद्ध की श्रेष्ठता का समर्थन नहीं किया है। शुक्र का स्पष्ट मत है कि धर्म युद्ध या कूट युद्ध जिसमें शत्रु का विनाश हो वही उचित है। वास्तव में शुक्र ने यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए धर्म युद्ध पर कूट युद्ध को वरीयता दी है। शुक्र ने युद्ध को पापपूर्ण एवं जघन्य कृत्य नहीं माना, अपितु उल्लेख किया है कि युद्ध में मरने पर क्षत्रिय को उत्तम फल की प्राप्ति होती है। क्षत्रिय के लिए युद्ध को पवित्र कर्तव्य मानने का आग्रह शुक्र की इस अपेक्षा को व्यक्त करता है कि वह अवसर आने पर युद्ध से पलायन न करें।

(५) पराजित पक्ष के प्रति व्यवहार : शुक्र ने युद्ध में विजय के बाद विजयी राजा को विजित राज्य व उसकी प्रजा के प्रति दुर्भावनापूर्ण कार्यवाही न करने का परामर्श दिया है। उन्होंने विजयी राजा को विजित राज्य की प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश दिया है। शुक्र ने विजयी राजा से अपेक्षा की है कि वह शत्रु को जीतकर योग्यतानुसार उससे कर ग्रहण करे, परिस्थिति के अनुसार शत्रु के राज्य के आधे अंश या सम्पूर्ण राज्य पर अपना आधिपत्य कर ले। उसके पश्चात् शत्रु की प्रजा को हर प्रकार से प्रसन्न रखे तथा अपनी प्रजा की भांति ही उसका पालन करे। शुक्र ने राजा को यह परामर्श भी दिया है कि वह विजित राज्य में कार्यरत मन्त्रि परिषद को हटाकर अपने प्रति निष्ठा रखने वाले नवीन मन्त्रि परिषद की नियुक्ति कर दे। यदि वह पराजित राजा का राज्य छीन ले तो उसे, जागीर आदि जीविका के लिए प्रदान करे। विजेता राजा को जीते गए राज्य में स्वेच्छाचारी ढंग से शासन नहीं करना चाहिए। उसकी पुत्रवत् रक्षा करते हुए उसे प्रसन्न रखा जाना चाहिए और उसे अपना बना लेना चाहिए। वस्तुतः शुक्र के इस विवरण में यह भाव निहित है कि पराजित राज्य की प्रजा एवं समाज के धार्मिक नैतिक व सामाजिक मूल्यों की रक्षा की जानी चाहिए और प्रजा का पालन भी किया जाना चाहिए।

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