kahani ! kahaniyan ! hindi kahani किसी चीज के लिए लालसा क्यों अच्छी नहीं होती ?
हम कौन हैं, क्योंकि एक बार हम यह भूल जाएं कि 'मैं कौन हूं' तो फिर 'मैं अपने जीवन में क्या चाहता हूं' इसकी स्मृति भी चली जाती है। फिर जीवन में कोई प्रसन्नता और शांति नहीं रह जाती।
किसी चीज को हासिल करने की तड़प हमारे भीतर ऐसी चेन रिएक्शन शुरू कर देती है, जो हमें उस जीवन की ओर ले जाती है, जिसमें प्रसन्नता और शांति के लिए कोई स्थान नहीं होता। आध्यात्मिक अभ्यास व ध्यान हमें इस स्थिति से बचाता है।
किसी इंद्रियगत वस्तु से बार-बार संबंध आना उसके प्रति लालसा या प्रबल इच्छा पैदा करता है। वस्तु के लिए ऐसी तड़प को अंग्रेजी में क्रेविंग कहते हैं। यदि आपको हर सुबह कॉफी पीते हैं, तो चाहे आप कॉफी के प्रति रुचि लेकर पैदा न भी हुए हों, आप के भीतर एक आदत की शुरुआत हो जाती है, जो क्रेविंग में बदल जाती है। जिसे लत लगना कहते हैं वह बार-बार दोहराए गए अनुभव से लगती है। अादत या लत की प्रकृति कुछ ऐसी है कि यह आपको खुशी नहीं देती, यह तकलीफ देती है। इसलिए कॉफी पीने से आप स्वर्ग में नहीं पहुंच जाएंगे पर आपको कॉफी न मिले तो आपको नर्क का अहसास हो सकता है!
बार-बार अनुभव अथवा उससे संबंध आपको उसके अधिक अनुभव के लिए बाध्य करता है। आप उसके बारे में सोचते हैं और इससे अधिक चाह की संवेदना निर्मित होती है। अपने नर्वस सिस्टम यानी तंत्रिका तंत्र में आप जहां भी ध्यान केंद्रित करेंगे, उससे संबंधित क्रेविंग शुरू हो जाती है। वह वस्तु और संबंधित इंद्रिय के संयोग से इच्छा या कामना पैदा होती है। उसके पीछे-पीछे गुस्सा चला आता है। जब भी कोई व्यक्ति क्रोधित होता है तो उसके पीछे-पीछे जरूर कोई इच्छा होती है। कामना पूरी हो, न हो यह क्रोध की ओर ही ले जाती है।
इसलिए आप किसी के प्रति क्रोधित हो जाते हैं, तो उससे लगाव पैदा कर लेते हैं। आप जब भी क्रोधित होते हैं, देर-सबेर आपको पश्चाताप होगा, जो लगाव को और बढ़ाता है। किसी चीज पर पश्चाताप व्यक्त करने से आप उस व्यक्ति या स्थिति से दूर नहीं हट जाते बल्कि आप और अधिक उसके भीतर चले जाते हैं। यह सब बहुत सूक्ष्म तरीके से होता है।
क्या कभी आपके ध्यान में यह बात आई कि आप जिससे भी क्रोधित होते हैं या नफरत करते हैं, आप उस व्यक्ति के बारे में खुद से भी ज्यादा सोचते हैं? जब आप उसके बारे में सोचते हैं, तो आप उत्तेजित हो जाते हैं या परेशान हो जाते हैं। दूसरी तरफ यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचें, जिसे आप चाहते हैं, तो आपको बहुत अच्छा अहसास होता है और आपका तंत्रिका तंत्र वह स्वरूप धारण कर लेता है।
आपका तंत्रिका तंत्र उपरोक्त दो में से कोई भी स्वरूप धारण करें, आप उस तरह के हो जाते हैं और आप उस तरह के लोगों की ओर आकर्षित होते हैं। इससे लिप्तता या उलझाव की स्थिति पैदा होती है। इससे बुद्धिमत्ता पर आवरण चढ़ जाता है, वह ठीक से काम नहीं कर पाती। आपकी बुद्धिमत्ता व आकलन शक्ति चली गई। स्थिति को समझने और उसका आकलन करने की योग्यता आप गंवा देते हैं। यह चेन रिएक्शन है और यह इतने सूक्ष्म रूप में होती है कि आपको अहसास भी नहीं होता। किसी चीज को प्राप्त करने की तड़प हो या उससे तिरस्कार की गहरी भावना, वह बुद्धि पर आवरण डाल देती है। विद्रुप हो चुकी बुद्धि आपको शांति से नहीं रहने देती। यह भावनाओं -यानी आपके भीतर पैदा होने वाले सूक्ष्म अहसास- को आने नहीं देती। जो भावनाएं होंगी वे स्थूल होंगी और आपको भारीपन का अहसास होगा।
बुद्धि पर आवरण पड़ता है तो सुखद चीजों की स्मृति गुम हो जाती है। जीवन में दो तरह की स्मृतियां होती हैं सुखद और अप्रिय स्मृति। बच्चों में प्राय: सुखद स्मृतियां ही अधिक होती हैं। इसीलिए वे इतने प्रसन्न दिखाई देते हैं। लेकिन, जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं हमारा भोलापन खो जाता है, अप्रिय स्मृतियां बढ़ती जाती हैं।
आध्यात्मिक अभ्यास सुखद स्मृतियों को अधिकाधिक वापस लाने में मदद करता है और अप्रिय स्मृतियों को नगण्य बना देता है। इसलिए रोज ध्यान करने का इतना महत्व है। यह हमें याद दिलाता है कि हम कौन हैं, क्योंकि एक बार हम यह भूल जाएं कि 'मैं कौन हूं' तो फिर 'मैं अपने जीवन में क्या चाहता हूं' इसकी स्मृति भी चली जाती है। फिर जीवन में कोई प्रसन्नता और शांति नहीं रह जाती।