kahani ! kahaniyan ! hindi kahani ! विक्रमादित्य की कहानी काल से कौन जीता है

kahani ! kahaniyan ! hindi kahani ! विक्रमादित्य की कहानी काल से कौन जीता है 

मानव जीवन में,समय,परिस्थिति और स्थान, बड़ी भूमिका अदा करते हैं। कई बार, जो कुछ भी घटित होना होता है, उसी के अनुरूप परिस्थितियां, बनती चली जाती हैं।

कलियुग में, एक ही चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं,और वो थे, सम्राट विक्रमादित्य। जिनके नाम पर भारतवर्ष में "विक्रम सम्वत" की शुरुआत हुई।

विक्रमादित्य एक बहुत ही पराक्रम, विद्वान,कुशल प्रजापालक, धर्मज्ञ एवं परोपकारी राजा थे। राजा विक्रमादित्य अपनी प्रजा को पुत्रवत् प्यार करते थे, तथा रात्रि में वेश बदल कर अपनी प्रजा के हालात और कुशलक्षेम जानने के लिए,नगर भ्रमण हेतु निकल जाया करते थे।

एक बार यूँ ही राजा विक्रमादित्य, वेश बदल कर,देर रात्रि में, नगर भ्रमण हेतु निकले।भ्रमण करते करते, अमृत वेला का समय हो गया। पौं फटने लगी थी।भोर के इस समय राजा विक्रमादित्य नगर की परिक्रमा वाले मार्ग से गुजर रहे थे। मार्ग के दूसरी ओर, घना जंगल प्रारम्भ हो जाता था। यकायक राजा ने देखा कि, एक नौजवान लक्कड़हारा,कन्धे पर कुल्हाड़ी लिये,जंगल में प्रवेश कर गया और लकड़ी काटने के लिए,एक ऊँचे वृक्ष पर चढ़ गया।

तत्काल ही राजा विक्रमादित्य ने देखा कि एक भयानक रीछ दौड़ा आया और उसी वृक्ष पर चढ़ने लगा, जिस पर, वह नौजवान लक्कड़हारा लकड़ी काट रहा था। रीछ को वृक्ष पर चढ़ते देख कर राजा को बड़ा अचम्भा हुआ,क्योंकि रीछ तो वृक्ष पर कभी नहीं चढ़ सकता। उस नौजवान लक्कड़हारे ने जब रीछ को अपनी ओर आते देखा, तो उसके हाथ पाँव फूल गए। भय के कारण,उसके हाथ से वृक्ष का टहनी छूट गयी और पृथ्वी पर गिर कर उसके प्राण पखेरु उड़ गए। तब रीछ वृक्ष से नीचे उतरा और राजा के देखते ही देखते, उसने एक सुन्दर लड़की का रुप धारण कर लिया और जंगल के समीप ही स्थित एक कुंऐ की जगत(मुंडेर)पर जाकर बैठ गई।

राजा दूर खड़ा कौतुहल से यह सब देख रहा था और सोच रहा था, कि यह लड़की बना हुआ रीछ अब क्या करेगा ?

थोड़ी ही देर में राजा के दो सिपाही, जो रात्रि गश्त पर थे, उधर आ निकले।और इत्तेफाक से दोनो सिपाही आपस में सगे भाई थे। छोटे भाई की नजर जब कुंए की मुण्डेर पर बैठी उस सुन्दर लड़की पर पड़ी तो बड़े भाई से बोला,"देख भाई, कितनी सुन्दर लड़की बैठी है! मेरा मन कर रहा है, कि मैं इस से विवाह कर लूँ।

"बड़ा भाई बोला,"बड़े भाई के होते हुए, छोटा भाई कैसे विवाह कर सकता है? बड़ा होने के नाते पहल मेरी है, इस लिये इससे विवाह तो मैं ही करूँगा।" तब छोटा भाई बोला,"इसे पहले मैने देखा है, इस लिये इससे विवाह तो मैं ही करूँगा।"

तब बड़ा भाई बोला कि हम तो व्यर्थ ही झगड़ रहे हैं,क्यों न हम इस लड़की से ही पूछ लें? यह हम दोनों में से जिसे पसन्द करेगी, वही इस लड़की से विवाह कर लेगा।

इस प्रकार आपस में निर्णय करके, दोनों भाई उस लड़की के पास पहुँचे। बड़े भाई ने उस लड़की से प्रश्न किया, "हे सुन्दरी, आप कौन हो, और यहाँ क्या कर रही हो?" वह लड़की बोली,"मैं पास ही एक गाँव में रहती हूँ,और अपने पति की तलाश में निकली हूँ। छोटा भाई बोला,"तुम्हारा पति कहाँ है? तुम चाहो तो उसे ढूँढने में हम तुम्हारी सहायता कर सकते हैं।"

तब वह लड़की बोली,"अभी तो मैं, कँवारी हूँ,और किसी योग्य वर की तलाश में निकली हूँ।" तब छोटा भाई बोला, "हम दोनों भाई भी अभी कुंवारे हैं।यदि तुम चाहो तो हम में से किसी एक से विवाह कर सकती हो।" लड़की बोली,"मैं तुम दोनों में से एक से विवाह कर लूँगी,परन्तु मेरी एक शर्त है! दोनो भाई बोले," क्या शर्त है तुम्हारी ?" लड़की बोली," तुम दोनों में से जो भी अधिक बहादुर होगा, मैं उसी से विवाह करूँगी।" इतना सुनते ही दोनों भाई, स्वयं को एक दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने की इच्छा रखते हुए,आपस में युद्ध करने लगे।

लड़ते-लड़ते दोनों भाईयों ने तलवारें निकाली,और एक दूसरे के पेट में आर पार दी। इस प्रकार तड़फ-तड़फ कर दोनों भाईयों ने अपने प्राण त्याग दिए। तब वह लड़की जोर से हँसी और उठ कर एक दिशा की ओर चल पड़ी।

यह लड़की (छलावा)अब क्या करेगी ?, ऐसा सोचते हुए,राजा विक्रमादित्य भी थोड़ी-थोड़ी दूरी रखते हुए, उस लड़की के पीछे-पीछे चलने लगे।.....

अब तक सूर्य भगवान् भी पूर्ण रूप से उदय हो चुके थे। परंतु सम्राट विक्रमादित्य "एक रीछ के वृक्ष पर चढ़ने और फिर एक सुन्दर लड़की का रुप बदलने की" विचित्र घटना अपनी आँखो से देख कर अपनी सुध-बुध खो बैठे थे।।

उन्हें अपनी भूख-प्यास व राजपाठ के विषय में कुछ भी ध्यान न रहा। ध्यान रहा, तो केवल उस रहस्यमयी सुन्दर लड़की के विषय में जानने की जिज्ञासा! अतः उस सुन्दर लड़की का सावधानी पूर्वक दूरी बना कर पीछा करते-करते, लगभग दो सौ कदम आगे चलने के बाद,राजा विक्रमादित्य के विस्मय की सीमा न रही! क्योंकि, राजा विक्रमादित्य के देखते ही देखते, एकाएक वही सुन्दर लड़की,अब एक लड़की नहीं रही थी, अपितु एक जहरीले नाग का रूप धारण कर चुकी थीं।

वह जहरीला नाग अब बड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगा। कुछ दूर आगे चलकर एक नदी बह रही थी। वह भयानक जहरीला नाग,नदी किनारे पहुंच कर, कुछ क्षण रुका और राजा के देखते ही देखते,नदी में कूद गया। नदी के बीचों-बीच एक नाव चल रही थी, जिस में बीस-पच्चीस लोग सवार थे। वह जहरीला नाग उस नाव की तरफ बढ़ने लगा। सम्राट विक्रमादित्य किनारे पर खड़े यह सब कुछ देख रहे थे। देखते ही देखते, वह ज़हरीला नाग उस नाव में कूद गया।

नाग पर नजर पड़ते ही, नाव में भगदड़ मच गई और अपनी जान बचाने के लिए लोग नाव से पानी में कूद पड़े। उनमें से जो लोग तैरना जानते थे, वे तो तैर कर, नदी से बाहर निकल गए, और जो तैरना नहीं जानते थे, वे सभी लोग, पानी में डूब कर मर गए।

थोड़ी देर के बाद,वह नाग नदी से बाहर निकला और नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ने लगा। सम्राट विक्रमादित्य उसके पीछे-पीछे चलने लगे।

कुछ दूर जाकर राजा विक्रमादित्य को एक बार फिर आश्चर्यचकित होना पड़ा, क्योंकि उस नाग ने एक बार फिर अपना रूप बदला। अब वह एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में था। राजा विक्रमादित्य ने सोचा कि इस बलै(रहस्यमयी प्राणी) के विषय में जानकारी लेने का,अब उचित अवसर है, क्योंकि इस समय यह बलै एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में है। अब मैं इस से, इसके बारे में सुगमता से पूछ सकता हूँ।

यह सोच कर राजा विक्रमादित्य शीघ्रता से उस रहस्यमयी ब्राह्मण की ओर बढ़ने लगे...

राजा विक्रमादित्य तो उस छलावे (रहस्यमयी बलै) का पीछा कर रहे थे।

अब राजा विक्रमादित्य  तेज-तेज कदमों से चलते -चलते, उस वृद्ध  ब्राह्मण (छलावे)के सम्मुख पहुँच गए,और उसे हाथ जौड़ कर प्रणाम किया। वृद्ध ब्राह्मण ने भी हाथ उठाकर  अभिवादन स्वीकार किया।

तब राजा विक्रमादित्य ने उस से प्रश्न किया,"आप कौन हैं?" वह बोला," तुम्हे दिखाई नही देता? , ब्राह्मण हूँ।"राजा बोला," आप असत्य बोल रहे हो,आप ब्राह्मण तो नहीं हो।"

वह बोला,"तो फिर तुम ही बता दो मैं कौन हूँ ?" राजा बोला ,"तुम वो नहीं हो, जो नज़र आ रहे हो।" वह बोला, "मैं जो कुछ भी हूँ, तुम्हें इससे क्या लेना-देना?,तुम अपने काम से काम रक्खो, और अपना रास्ता नापो।"

राजा बोला,"मैं सच्चाई जाने बिना आपका पीछा नहीं छोड़ूँगा।आपको सच्चाई बतानी ही पड़ेगी।" वह बोला, "मैंने तुम्हें बताया तो है, कि मैं एक ब्राह्मण हूँ।" राजा बोला,"  आप मुझसे झूठ नहीं बोल सकते। मैं आपका तब से पीछा कर रहा हूँ, जब आप रीछ बने हुए थे।

उस समय आप ने उस नौजवान लक्कड़हारे को मारा। फिर आप एक सुन्दर लड़की बने, और उन दोनों सिपाही भाईयों को एक- दूसरे के हाथों मरवा दिया।

फिर आप ने एक जहरीले नाग का रूप धारण करके,नदी में छलाँग लगा दी,और नदी पार कर रही नाव में घुस गये। और तुम्हारी दहशत के कारण नाव में सवार यात्रियों में भगदड़ मच गई, नाव पलट गई,और आधे यात्री नदी में डूब कर मर गए।.....

अब आपने वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया हुआ है। अब सीधी तरहं से सच-सच बता दो, आप कौन हो?"

वह बोला, "यदि न बताऊँ तो?"

यह सुन कर राजा ने अपनी तलवार निकाल ली,और बोले,"तो फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।।तुम जानते नहीं, यह राजा विक्रमादित्य की नगरी है,और मैं राजा का वफादार नौकर हूँ।

इस धर्मात्मा राजा की नगरी में, इतने लोगों की जान लेकर तुम जीवित बच कर नहीं जा सकते।अब मरने से पहले जल्दी से ये बता दो कि तुम कौन हो?"

राजा विक्रमादित्य की यह धमकी सुनकर, वह वृद्ध ब्राह्मण जोर-जोर से खिलखिलाकर हँस पड़ा,और बोला,"मैं जानता हूँ, कि यह महाप्रतापी सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी है, और मैं यह भी जानता हूँ ,कि तुम ही विश्वप्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य हो। फिर भी एक बात जान लो,  कि तुम मुझे नहीं मार सकते, बल्कि एक दिन ऐसा आएगा, कि मैं ही तुम्हें मरने के लिए विवश कर दूँगा।"

उसके यह बोल सुनकर राजा विक्रमादित्य सोचने लगे, कि जिसने इस वेष में भी मुझे पहचान लिया,वह कोई छोटी-मोटी हस्ती तो हो नहीं सकती ? तो राजा थोड़े विनम्र होकर बोले,"अब आपने मुझे पहचान ही लिया है, तो कृपया आप बताएँ, कि आप वास्तव में कौन हो?"

तब वह ब्राह्मण बोला,"किसी ने सत्य ही कहा है कि, संसार  में चार प्रकार के हठ प्रसिद्ध हैं। राज हठ,बाल हठ,त्रिया हठ,और योग हठ।

तुम राजा हो,राजहठ पर अड़े हो,बिना मेरी सच्चाई जाने तुम मानोगे नहीं, इस लिए मुझे बताना ही पड़ेगा, कि मैं कौन हूँ।

अतः राजन,अब ध्यान लगाकर सुनो कि मैं कौन हूँ, और तुम्हारी राजधानी में क्यों आया हूँ।" तब उस वृद्ध ब्राह्मण ने बताना शुरू किया,...... -  "ऐ राजन! मैं तुम्हें बताता हूँ कि मैं कौन हूँ। जो भी मैं बताऊँगा, एक-एक शब्द ध्यान लगाकर सुनना।

मेरा नाम "काल" है। तुम जानते हो, कि इस संसार में, जितने भी प्राणी जन्म लेते हैं, उनकी मृत्यु निश्चित है।

इसलिए इस भूमि को मृत्युलोक भी कहा जाता है। जब प्राणी माता के गर्भ में आता है, तो उसके पूर्णांग बनने के बाद, आत्मा उसमें प्रवेश करती है, अर्थात वह सजीव हो उठता है। उसी समय, उसकी मृत्यु का समय, स्थान और परिस्थिति, अर्थात, मृत्यु किस प्रकार से होगी, यह भी विधाता की ओर से निश्चित कर दिया जाता है। राजन! तुम यह भी जानते हो, कि दुनिया के हर प्राणी के जन्म-मरण का लेखा-जोखा चित्र गुप्त के पास है।

जब भी किसी प्राणी की मृत्यु का समय आ जाता है, तो वह धर्मराज को सूचित करते हैं। अब क्योंकि सभी प्राणियों की मुक्ति,(मृत्यु) का विभाग भगवान शिव के पास है।

अतः धर्म राज उस प्राणी को मृत्यु प्रदान करने की आज्ञा भगवान शिव से माँगते हैं। जब भगवान शिव आज्ञा दे देते हैं, तो धर्मराज मुझे, अर्थात "काल" को आज्ञा देते हैं।

तब मैं मृत्युलोक अथवा पृथ्वी पर आता हूं। मुझे यह पता होता है, कि किस प्राणी की, किस समय, किस स्थान पर, और किस परिस्थिति में मृत्यु होगी? मैं उस प्राणी को निश्चित समय पर, उसी निश्चित स्थान पर, लेकर जाता हूँ,अथवा पहुंचा देता हूँ,जहाँ पर उसकी मृत्यु लिखी हुई है, अथवा निश्चित है। और जिस प्रकार से उसकी मृत्यु लिखी गई है,मैं उस स्थान पर वैसी ही परिस्थितियाँ, अथवा हालात बना देता हूँ।

उस लक्कड़हारे को मैंने नहीं मारा।" राजा विक्रमादित्य बोले, " तुम फिर झूठ बोल रहे हो, मैने स्वयं अपनी आँखो से देखा है, कि उस लक्कड़हारे की मृत्यु का कारण तुम ही थे। वृद्ध ब्राह्मण बोला," बेशक कारण मैं बना था,लेकिन सांसारिक लोग तो यही समझते हैं, कि लक्कड़हारे की मृत्यु वृक्ष से गिर कर, वृक्ष का टहना टूटने के कारण हुई है।और फिर मुझे तो, मृत्यु देव धर्मराज के आदेश का पालन करना ही पड़ता है।

उसकी मृत्यु वृक्ष पर से गिरने के कारण लिखी गई थी। इस लिये मैंने रीछ बनकर वैसी ही परिस्थितियाँ, व हालात पैदा कर दिए। नही तो जरा सोचो, यदि असली रीछ होता, तो क्या कभी  पेड़ पर चढ़ पाता ? कदापि नही। परन्तु, वह तो मैं था। और मेरे लिए तो कुछ भी असंभव नहीं है।"......

अगर उन सिपाही भाईयों की बात करें, तो उन को भी मैंने नहीं मारा, उनकी मृत्यु एक दूसरे के हाथों लिखी थी।अत: उनके लिए मुझे सुन्दर लड़की बनना पड़ा। नाव में सवार कुछ लोगों की मृत्यु पानी में डूबने से लिखी थी, इसके लिए मुझे भयानक नाग का रूप धारण करना पड़ा। राजन! मुझे लगता है, कि अब तो आप अच्छी तरह समझ गये होंगे,कि मैं कौन हूँ और तुम्हारी नगरी में क्यों आया था ?   और यह भी समझ गए होंगे,कि समय, स्थान और परिस्थिति,की सांसारिक प्राणी के जीवन में कितनी  बड़ी भूमिका होती है।" राजा विक्रमादित्य ने वृद्ध ब्राह्मण रूपी "काल" की बात बड़े ध्यान से सुनी और गम्भीर हो गये। "काल" कहने लगा," हे  राजन! अब मैं चलता हूँ।" राजा विक्रमादित्य बोले," हे कालदेव! आपने मुझे बहुत अच्छी जानकारी दी है जिसके लिये, मैं आपका बहुत अभार व्यक्त करता हूँ। कृपया, जाने से पहले, मेरे एक और प्रश्न का उत्तर देते जाईए।"

कालदेव बोले,"पूछो,क्या पूछना चाहते हो ? शीघ्र पूछो, मेरे पास इतना वख्त नहीं है।"

राजा विक्रमादित्य बोले," कृपा करके मुझे यह बताईये, कि मेरी मृत्यु कब, किस स्थान पर और किस प्रकार से होगी?" कालदेव बोले,"हे राजन! मैं यह तो बता सकता हूँ, कि तुम्हारी मृत्यु कहाँँ और किस प्रकार से होगी ?  परन्तु यह नहीं बता सकता, कि तुम्हारी मृत्यु कब होगी ? राजा विक्रमादित्य बोले, " हे कालदेव!  मृत्यु का समय बताने में आपको क्या आपत्ति है ?" कालदेव बोले,"हे राजन! यदि मैंने पहले ही आपको मृत्यु का समय बता दिया, तो इसी क्षण  से आप चिन्ताग्रस्त हो जाओगे, और आप तो जानते ही हो, कि चिन्ता,चिता समान होती है।अभी तो आपको अपने शासनकाल में बहुत से शुभ और जन कल्याण के कार्य करने हैं।"

राजा विक्रमादित्य बोले,"चलो,समय न सही, यह तो बता दो कि मेरी मृत्यु कहाँ और कैसे होगी ?कालदेव बोले,"सुनो राजन! तुम्हारी मृत्यु,तुम्हारे ही महल में,सीढ़ियों पर से पाँव फिसल कर गिरने के कारण से होगी।" इतनी बात सम्राट विक्रमादित्य को बता कर वृद्ध ब्राह्मण रूपी काल,शीघ्रता से एक दिशा की ओर चल पड़े,और कुछ दूर जाकर विलुप्त हो गये।

इस वख्त तक सूर्य भगवान् भी पूर्ण रूप से अस्त हो चुके थे। चारों तरफ अंधकार छा गया था। राजा विक्रमादित्य अब तक शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुके थे।अतः मन में गहन सोच-विचार लिये हुए, तेज कदमों से अपने महल की प्रस्थान कर गये।और आगे चलकर, सचमुच में ऐसा ही हुआ।

राजा विक्रमादित्य की मृत्यु, अपने महल की सीढ़ियों से फिसल कर गिरने से ही हुई थी।और इस कथन की पुष्टि, इतिहासकारों ने भी की है।

।। जय श्री गणेशाय नमः।।🙏

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