astrology ! horoscope today ! zodiac जन्मकुंडली का सातवाँ घर और एक से अधिक विवाह का योग ?
जन्मकुंडली का सातवाँ घर
जन्मकुंडली में सप्तम स्थान से शादी का विचार किया जाता है | अब आप भी अपनी कुंडली में सप्तम स्थान को देखकर अपने विवाह और जीवन साथी के बारे में जान सकते हैं | नीचे लिखे कुछ साधारण नियम हर व्यक्ति पर लागु होते हैं | कुल १२ राशियों का सप्तम स्थान में होने पर क्या प्रभाव जीवन पर पढता है यह मेरे स्वयं के अनुभवों से संकलित किया ज्ञान है |
शुक्र यहाँ का कारक ग्रह है और शनि सप्तम भाव में बलवान हो जाता है | गुरु यहाँ निर्बल हो जाता है तो सूर्य तलाक की स्थिति उत्पन्न करता है | मंगल यदि सप्तम स्थान में हो तो मांगलिक योग तो होता ही है साथ में घर में क्लेश और नौकरी में समस्याएं उत्पन्न करता है | बुध का बल भी यहाँ क्षीण हो जाता है तथा राहू केतु पत्नी से अलगाव उत्पन्न करते हैं | राहू सप्तम में हो तो जातक अपनी पत्नी से या पत्नी जातक से दूर भागती है | यदि जीवनसाथी की कुंडली में भी राहू या केतु सप्तम स्थान में हो तो तलाक एक वर्ष के भीतर हो जाता है |
केतु के सप्तम स्थान में होने पर संबंधों में अलगाव की स्थिति जीवन भर बनी रहती है | पति पत्नी दोनों एक दुसरे को पसंद नहीं करते | सप्तम स्थान का स्वामी यदि सप्तम में ही हो तो व्यक्ति विवाह के पश्चात उन्नति करता है और व्यक्ति का दाम्पत्य जीवन अत्यंत मधुर और शुभ फलदायी साबित होता है | यह था सप्तम भाव में बैठे ग्रहों का फल | यदि सप्तम भाव में कोई ग्रह ही न हो तो क्या होता है ?
जानने के लिए देखिये कि सप्तम स्थान में आपकी कुंडली में कौन सी राशी या कौन सा अंक है |
१ अंक हो तो मेष राशी, २ वृषभ, ३ मिथुन, ४ कर्क, ५ सिंह, ६ कन्या, ७ तुला, ८ वृश्चिक, ९ धनु, १० मकर, ११ कुम्भ और १२ मीन
मेष और वृश्चिक राशी का स्वामी मंगल
वृषभ और तुला राशी का स्वामी शुक्र
मिथुन और कन्या का स्वामी बुध
कर्क राशी का स्वामी चन्द्र
सिंह राशी का स्वामी सूर्य
धनु मीन राशि का स्वामी गुरु और
मकर कुम्भ का स्वामी शनि होता है
एक से अधिक विवाह का योग
यावन्तो वा विहन्गा मदनसदनगाश्चेन्निजाधीशद्रिष्टा- स्तावन्तो निर्विवाहास्त्व्थ सुमतिमता ज्ञेयमित्थं कुटुम्बे | कार्यो होराग्मज्ञैरधिकबलवतां खेचराणां हि योगा -ददेष्यंतत्रवीर्यंरविविधुकुभुवमन्गदिक्शैलसंख्यम् ||
सप्तम स्थान में जितने ग्रह हों, उतने ही विवाह होते हैं | लेकिन उन पर सप्तमेश की दृष्टि आवश्यक है इसी प्रकार कुटुंब स्थान अर्थात् दुतीय स्थान में जितने ग्रह द्वितीयेश से दृष्ट हों, उतने ही विवाह होते हैं बुद्धिमान दैवग्यों अधिक बल वाले ग्रह के योगों से विवाह की संख्या का विचार करना चाहिए इस प्रशंग में सूर्य, चन्द्र व मंगल का क्रमशः 6, 10, 7 रूपा बल होता है | शेष ग्रहों का 6 रूपा बल होता है, ऐसा पद्दति के नियम से स्वतः सिद्ध है अर्थात् शेष ग्रह 6 रूपा से अधिक बलि होनें पर बलि मानें जाते है | इस श्लोक की संख्या प्राचीन टीकाकारों नें उक्त प्रकार से ही की है | लेकिन सुकसुत्त्रों के सन्दर्भ में इन पर नई रौशनी पड़ती है | सामान्यतः तीन रूपा या अंश तक षड्बल होनें पर ग्रह निर्बल, 6 कम से होने पर मद्दयम बाली और छह से अधिक बल होने पर बलवान माना जाता है | यह बात पद्दति ग्रंथों से सिद्ध है तथा हमारे विचार से भी यही बात यहाँ उपयुक्त है | सूत्रों का पाठ प्रस्तुत है |
(1) कल्त्राधिपेन कुटूम्बाधिपेन वा दृष्टा यावन्तो ग्रहाः कलत्रस्थानं कुटुम्बस्थानं वा गताः तावत् संख्यकानि कलत्राणी भवन्ति |
(2) अथवा बलाधिक्यात् |
(3) तत्र रवेः षट् |
(4) चन्द्रस्य दश |
(5) भौमश्य सप्त |
(6) बुधस्य सप्तदश |
(7) गुरोः षोडश |
(8) शुक्रस्य विन्शतिः |
(9) शनेरेकोनविन्शतिः |
(10) राहोः |
(11) केतोः
(12) इत्यादि ज्ञेयम्
(13) सत्यमेन कलत्र चिन्ता | (शुकसुत्र)
श्लोक की प्रथम पंक्ति का अर्थ सुत्रानुसारी हमनें किया है | यद्यपि 'कुटुम्ब' शब्द का अर्थ प्राचीनो ने 'अन्य परिवारजन' किया था, लेकिन सूत्रानुसार सप्तम या द्वितीय में जितने ग्रह सप्तमेश व द्वितीयेश में दृष्ट हों उतनी ही स्त्रियाँ होती हैं, यह बात सिद्ध होती है तथ यही उपयुक्त है | लेकिन बल के सन्दर्भ में सूत्रकार नें जो संख्या बताई है वह संख्या वास्तव में विंशोत्तरी दशा में इन ग्रहों के दशा वर्षों की संख्या ही है | इसी आधार पर सूर्य, चन्द्रमा व मंगल का बल भी गणेश कवि ने 6 , 10, 7 क्रमशः माना है जो सुत्रानुसारी है | लेकिन शेष ग्रहों के बल का उल्लेख श्लोकों में नहीं है यह बल विचार प्राचीन जैमिनियत या पराशरमत या यवन मतानुशार पद्धति ग्रंथों के भी विरुद्ध है | हमारी अल्प बुद्धि मई इस सुत्त्रोक्त बल का तारतम्य अवगत नहीं होता है | विद्दवान पाठक इस प्रकरण की प्रमाणिकता पर विचार करें | अस्तु, विवाह संख्या के विषय में भी आजकल जोतिषीयों को आधुनिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए | आजकल एकाधिक विवाह गैरकानूनी हैं | अतः सामाजिक पदवी प्रतिष्ठा व स्थिति देखकर एकाधिक विवाह की बात कहनी चाहिए | सामान्यतः द्दितियेश व सप्तमेश पर शुभ प्रभाव या इनका परस्पर सम्बन्ध अथवा किसी शुभ भाव में इस्थिति विवाह की द्योतक होगी | लेकिन साधुओं सन्यासियों आदि के सन्दर्भ में संतान योगों की तरह विवाह योगों को भी निष्क्रिय ही समझना चाहिए |
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