astrology ! horoscope today ! zodiac ! daily horoscope गर्भ मे बच्चा 9 महीने और 9 दिन ही क्यो रहता है

astrology ! horoscope today ! zodiac ! daily horoscope  गर्भ मे बच्चा 9 महीने और 9 दिन ही क्यो रहता है ?

उत्तम संतान हेतु गर्भावस्था में माता द्वारा किया जाने वाले ज्योतिषीय उपाय

गर्भ मे बच्चा 9 महीने और 9 दिन ही क्यो रहता है ?

हमारे ब्रह्मांड के 9 ग्रह अपनी अपनी किरणों से गर्भ मे पल रहे बच्चे को विकसित करते है | हर ग्रह अपने स्वभाव के अनुरूप बच्चे के शरीर के भागो को विकसित करता है |

भारतीय संस्कृति में ऐसे अनेक कथाएं प्रचलित हैं जिनसे यह ज्ञात होता है कि गर्भ में ही बच्चे सचेत हो जाते हैं। सोच विचार का प्रभाव उनपर पडने लगता है। जब बच्चा मां के गर्भ में आता है तब से ग्रहों का अच्छा या बुरा प्रभाव उस पर पड़ता है।

वेदो और शास्त्रों में मनुष्य जीवन में सोलह संस्कारो का काफी महत्व बताया गया है .उसी अनुसार गर्भ की सुरक्षा के लिए एवं पहली बार गर्भ धारण करने पर इन विधान का पालन आवश्यक है चतुर्थ माह में पुंसवन संस्कार और छठे या आठवें में सीमन्तो नयन संस्कार का विधान बताया गया है।

गर्भस्थ स्त्री की जन्मपत्रिका में जो ग्रह शुभ अवस्था में होते हैं, उस ग्रह संबंधी मास में स्वस्थ रहती है और गर्भ की पुष्टि होती है लेकिन जो ग्रह पीडि़त नीच या शत्रु राशि में हों दु:स्थान में हों उस ग्रह से संबंधित मास में कष्ट आने की संभावना अधिक रहती हैं | उस समय में डॉक्टर की सलाह के साथ विशेष ज्योतिषीय उपाय भी काफी लाभदायक होते है |

गर्भ से 1 महीने तक शुक्र का प्रभाव रहता है स्त्री की नैसर्गिक जन्मपत्रिका में यदि शुक्र अस्त वक्री या पीडि़त हों तथा गोचर में भी पीड़ित हो तो इस समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। शुक्र की आराधना हेतु ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नमः

(जप संख्या – 18000) ’ इस मंत्र का जाप करना चाहिए।

दूसरे महीने मंगल का प्रभाव रहता है | दूसरे माह में मांस की उत्पत्ति होती है कारक मंगल हैं। स्त्री की जन्म पत्रिका में मंगल यदि षड्बल में कमजोर हो में हो या दूसरे माह के दौरान गोचर वश वक्री अस्त या पीडि़त हो तब मंगल देव की आराधना हेतु स्त्री को ‘ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नमः ( जप संख्या – 10000 ) मंत्र का जाप करना चाहिए।


तीसरे महीने गुरु का प्रभाव रहता है | तीसरे महीने में लिंग का निर्धारण हो जाता है हाथ-पैर आदि विकसित होने लगते हैं। अब पिण्ड जीव रूप में आ जाता है। जीवन प्रदान करना और वृद्धि करना बृहस्पति देव का कारक तत्व है।

अंग विकास और हलचल तीसरे माह में आरंभ हो जाती है अत: इस माह में बृहस्पति देव की आराधना करनी चाहिए। गर्भस्थ स्त्री की जन्मपत्रिका में यदि बृहस्पति पीडि़त हों या गोचरवश इस माह के दौरान वक्री,अस्त या अन्य रूप से पीडि़त हो तो ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नमः

(जप संख्या – 19000) बृहस्पति देव की प्रसन्नता हेतु मंत्र जाप करना चाहिए


चौथे महीने सूर्य का प्रभाव रहता है | | गर्भाधारण के चौथे महीने शरीर में हड्डियों का निर्माण शुरु हो जाता हैं। हड्डियां मजबूती व सामथ्र्य का प्रतीक है। मजबूती व सामथ्र्य सामर्थ्य के कारक सूर्यदेव है । यदि स्त्री की कुण्डली में सूर्य देव पीडि़त हों तो समस्या आती है। इस माह में यदि गोचरवश भी सूर्य राहु या केतु से पीडि़त हों यानि सूर्य ग्रहण लगे तो भी गर्भ को कष्ट संभावित है। इस माह सूर्य देव के मंत्र का जाप करना चाहिए। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नमः

(जप संख्या – 7000 )


पांचवे महीने चंद्र का प्रभाव रहता है | पांचवे महीने में गर्भस्थ पिण्ड में रक्त का निर्माण होने लगता है। रक्त द्रव रूप है। चन्द्रमा मन व भावनाओं को भी नियंत्रित करते हैं इसी महीने में रक्त, नसें और त्वचा का निर्माण होता है। गर्भवती स्त्री की पत्रिका में यदि चन्द्रमा अस्त हों, नीच राशि में या षड्बल में कमजोर हों गोचरवश ग्रहण योग बना दें तो विशेष ध्यान रखना चाहिए | यदि माता चन्द्रमा की आराधना करें तो लाभदायक सिद्ध होगा।

ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्राय नमः (जप संख्या – 11000 )


छटे महीने शनि का प्रभाव रहता है | छठें महीने में गर्भ में पल रहे बच्चे के नाखून व रोम निकल आते हैं। इनका विकास भी अच्छे स्वास्थ्य का प्रमाण है।

नाखून, बाल, रोम आदि शनि देव के विषय होने के कारण इस माह के स्वामी शनिदेव हैं। स्त्री की जन्मपत्रिका में शनि यदि वक्री, पीडि़त या अस्त हों तो शिशु को कष्ट हो सकता है अत: इस माह में स्त्री को शनिदेव की आराधना करनी चाहिए।

ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नमः (जप संख्या – 23000 )


सातवे महीने बुध का प्रभाव रहता है | सातवां महीना महत्वपूर्ण है। इस माह में बुद्धि का प्रवेश होता है। चेतन होने पर मस्तिष्क सुख-दुख महसूस करने लगता है। जीव में चेतना .बुद्धि, विवेक आदि के कारक बुध इस माह के स्वामी हैं। यदि स्त्री की नैसर्गिक जन्मपत्रिका में बुध पीडि़त हो और यदि गोचरवश बुध पीडि़त हो तो संस्कारों पर भी प्रभाव पड़ता है है। बुध देव की आराधना करनी चाहिए।

ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नमः (जप संख्या – 9000 )


आठवां महीना चूंकि थोड़ा जटिल होता है इसलिए गर्भस्थ महिला को आराम करने की सलाह दी जाती है। आठवें महीने का स्वामी स्वयं लग्नेश है। सुरक्षा की दृष्टि से स्त्री को लग्नेश की आराधना करनी चाहिए।

नौवें माह के चन्द्रमा और दसवें माह के सूर्य स्वामी होते हैं।


पुराणों में गर्भ धारण करने के साथ ही स्त्रियों के लिए श्री गर्भ रक्षाम्बिका स्तोत्रं का वाचन उत्तम बताया गया है।

कुशल ज्योतिषी के द्वारा गर्भस्थ माता की कुंडली के शुभ और अशुभ ग्रहो का अध्यन करके गर्भकाल का महीना और सम्बंधित ग्रहो की परिस्थिति अनुसार गर्भस्थ महिला और बच्चे के स्वास्थय का पूरा CHART बनाकर जरुरत अनुसार विशेष ज्योतिषीय उपाय काफी लाभदायक होते है |

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