kahani ! kahaniyan ! hindi kahani हर कोई दूसरे पर प्रभुत्व पाने में क्यों लगा रहता है?

kahani ! kahaniyan ! hindi kahani  प्रेम को ही अपना लक्ष्य बनाना चाहिए, जो शाश्वत हो।

      हर कोई दूसरे पर प्रभुत्व पाने में क्यों लगा रहता है?





आंतरिक ऊर्जा का आनंद बाहर की सारी दौड़ को खत्म कर देता है। हमारे अंदर जो अनंत जीवन ऊर्जा है, वाइटल फोर्स है, वह स्वयं आप ही हैं। वह ऊर्जा कहीं से इकट्‌ठी नहीं की गई है, अन्यथा कभी न कभी समाप्त हो जाती।


ऊर्जा (एनर्जी) का कार्यात्मक रूप शक्ति (पावर) है। बाह्य जगत की ऊर्जा और शक्ति से तो हम परिचित रहते हैं लेकिन, अपनी आंतरिक ऊर्जा से अपरिचित रह जाते हैं। इसी से शक्तिहीनता का अहसास होता है और फिर हम उसे बाहर से पूरा करना चाहते हैं। अपनी जीवन-शक्ति की समझ पैदा हो तभी व्यक्ति 'उस एक' में सबको और सब में 'उस एक' को देख पाता है।

कई मातहतों का बॉस होना शक्ति का अनुभव कराता है। धन की शक्ति इससे थोड़ी बेहतर होती है। धनी भी अपने को शक्तिहीन पाता है। रिश्तेदार, राजनेता, इनकम टैक्स अफसर सब उसके पीछे पड़े रहते हैं। वे अधिकारियों की जी-हुजूरी से त्रस्त हो जाते हैं।

यश और प्रतिष्ठा की भी शक्ति होती है। लोग मुझे जानें, दूर-दूर तक मेरा नाम हो, इसकी भूख बड़ी गहरी होती है। वह औरों से इस बात की मान्यता चाहता है कि वह भी कुछ है! लेकिन उसे यह डर भी बना रहता है कि जो आज प्रतिष्ठा दे रहे हैं, कल वे निंदा न करने लगें। लोगों का तो कोई भरोसा नहीं। लोग एक ही काम करते-करते थक जाते हैं, हो सकता है कल किसी और के गीत गाने लगें। और अगर कल अन्य लोग प्रतिष्ठा पाने लगें तो फिर उनके प्रति उसके मन में ईर्ष्या की भावना खड़ी हो जाएगी।

हम प्रेम का उपयोग भी शक्ति के लिए करते हैं। राजनेता बड़े दायरे में, लाखों-करोड़ों लोगों पर मालकियत की कोशिश करता है। आम आदमी कोशिश में है कि ज्यादा नहीं तो दो-चार लोगों पर ही मालकियत हो जाए। कई बार पति-पत्नी का असली संघर्ष इसी बात का होता है कि असली मालिक है कौन?

समृद्ध ज्ञान-कोष से भी, कुछ जानने के दंभ से भी शक्ति का एहसास होता है। हालांकि, यह मामला ज़रा बारीक है। गरीब साधु-संत इसी के बूते प्रतिष्ठित रहे। राजा जब उनके पैर छूता, उनका घमंड और बढ़ जाता!

पूर्ण शक्तिशाली होने का कोई उपाय नहीं है। हर कोई अपनी कमज़ोरी छिपाने की जुगत में ही लगा है। आदमी अपनी कमज़ोरी से खुद तो वाकिफ रहता है, लेकिन यह नहीं चाहता कि इसका पता दूसरों को लगे। इसी कोशिश में वह अपने इर्द-गिर्द ऐसा आडम्बर रचता जाता है, जिससे लोग उसे शक्तिशाली समझें। लेकिन बाहरी प्रयासों से, भीतर जो कमज़ोरी का अहसास है,वह कभी जाता नहीं।

आध्यात्मिक व्यक्ति वह है जो इस पर गौर करे। स्वयं को ऑब्जर्व करने पर आप पाएंगे कि वह जो एहसास था कमज़ोरी का, वह है ही नहीं। बल्कि, वहां तो विराट ऊर्जा मौजूद है। आंतरिक ऊर्जा का आनंद बाहर की सारी दौड़ को ख़त्म कर देता है। हमारे अंदर जो अनंत जीवन ऊर्जा है, वाइटल फोर्स है, वह स्वयं आप ही हैं। वह ऊर्जा कहीं से इकट्‌ठी नहीं की गई है, अन्यथा कभी न कभी समाप्त हो जाती। न आप इससे जुदा हो सकते हैं, न इसके मिटने का कोई प्रश्न है।


इस आंतरिक ऊर्जा का अहसास अत्यंत महत्वपूर्ण है। नाद,नूर,गंध, स्वाद सहित सारे दिव्य अनुभव उस जीवन ऊर्जा के ही अनुभव हैं और वह ऊर्जा स्वयं चैतन्य है। उसमें जानने की क्षमता भी है। विज्ञान की शक्ति में स्वयं को जानने की क्षमता नहीं है, क्योंकि यह जड़ है, अचेतन है। जो भीतर है, वह चेतन शक्ति है। इस ऊर्जा में आपकी जड़ें जितनी गहरी होंगी, आपका जीवन उतना रूपांतरित होता जाएगा। आप स्वयं की परिपूर्णता के एहसास से भरे होंगे।


धन्यवाद-भाव इसी से उपजता है। तभी यह भी पता चलता है कि जैसा मैं हूं, वैसा ही सब है। एक अद्‌भुत प्रेम उत्पन्न होगा, जिसमें न कोई मालकियत, न कोई कब्जा और न कोई सूक्ष्म हिंसा। कुछ भी नहीं। हमें ऐसे प्रेम को ही अपना लक्ष्य बनाना चाहिए, जो शाश्वत हो। 

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