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बंधन लगाइए :- अपने जीवन दर्शन में भक्ति जरूर जोड़ें
पढ़े-लिखे लोगों को फिलासॉफर होने का भी शौक लग जाता है। कई शिक्षित लोग तो कोई भी बात करेंगे तो बिल्कुल दार्शनिक अंदाज में सोचेंगे, अपनी बात कहेंगे और काफी हद तक दार्शनिक जैसा करेंगे। दर्शनशास्त्र है तो अद्भुत विषय लेकिन, जब ज़िंदगी के निर्णय व्यावहारिक धरातल पर लेने हों तो अपने 'दर्शन' के प्रति थोड़ा सावधान रहें। फिलासॉफी बिना द्वंद्व के समाधान नहीं देती। दर्शनशास्त्र उससे जुड़ने वाले को उठाता भी है, गिराता भी है। तर्कों का जाल फेंकता है और आखिर में आपको यह भी सुनाई दे सकता है कि मानो तो तुम्हारी मर्जी, न मानो तो तुम्हारी मर्जी। क्योंकि प्रबल प्रमाण क्या है, यह किसी को समझ में नहीं आता। विज्ञान प्रमाण मांगता है और जुटाता भी है।
दर्शनशास्त्र भी प्रमाण की बात करता है। जब लोग इनसे जुड़कर छोटी-छोटी बात पर प्रमाण मांगने लगते हैं तो मप्र के मालवा की भाषा में कहा जाता है- वे 'बेंडे' हो गए हैं। बेंडा जिसे यह मालूम नहीं कि करना क्या है, पर किए चला जाता है। फिलासॉफी का उपयोग करना है तो उस पर भक्ति का छींटा जरूर लगाएं। भगवान का भरोसा और भक्ति का भाव यदि 'दर्शन' से जुड़ जाए तो यही दर्शनशास्त्र आपको अद्भुत स्थिति दे सकता है। वरना बिना भक्ति के दर्शनशास्त्र आपके भीतर दो पक्षों में उलझाता रहेगा- मंडन और खंडन। हर व्यक्ति के भीतर फिलासॉफर होता है लेकिन, उसे खुला मत छोड़िएगा।
बंधन लगाइए फिर देखिए आपका वह भीतरी व्यक्तित्व मनुष्य होने का कितना आनंद पहुंचाता है।