शुभ नक्षत्र या पुष्य नक्षत्र योग क्या होता है

 शुभ नक्षत्र या पुष्य नक्षत्र योग क्या होता है 

शुभ नक्षत्र या पुष्य नक्षत्र योग क्या होता है


शुभ नक्षत्र या पुष्य नक्षत्र योग को ग्रहों का राजा कहा जाता है। 27 नक्षत्रों में एक यही ऐसा अकेला नक्षत्र है जिसमें कुछ विशेष कार्य सिद्ध किये जाते हैं। सप्ताह के प्रत्येक दिवस के अनुसार इस नक्षत्र का जब नाम जुड़ता है तो उस दिन को इस नक्षत्र का फल तथा करने वाले कार्य बदल जाते हैं। मैं यहां पर आपको सप्ताह के प्रत्येक दिन के इस नक्षत्र के कार्य बता रहा हूं जिससे आप इस शुभ नक्षत्र के फल का पूर्ण लाभ उठा सकें


रविपुष्य- रविवार को पुष्य नक्षत्र होने पर रविपुष्य के नाम से जाना जाता है। इस दिन बहुत ही शुभ कार्य किये जा सकते हैं जिसमें कि विशेष रत्न धारण, कोई भी विशेष व महत्त्वपूर्ण कार्यसिद्धि अथवा कोई भौतिक सामग्री जैसे स्वर्ण अथवा वाहन आदि खरीदा जा सकता है।


सोमपुष्य- सोमवार को पुष्य नक्षत्र होने पर सोमपुष्य के नाम से जाना जाता है। इस योग में किसी भी प्रकार का कोई प्रयोग करने से उस प्रयोग में पूर्ण सफलता प्राप्त होती है और किसी प्रकार के व्यवधान उत्पन्न नहीं होते हैं।


मंगलपुष्य- मंगलवार को पुष्य नक्षत्र होने पर मंगलपुष्य के नाम से जाना जाता है। इस योग में वशीकरण सम्बन्धी समस्त कार्य किये जाते हैं और उनमें इस योग के प्रभाव से पूर्ण सफलता प्राप्त होती है।


बुधपुष्य- बुधवार को पुष्य नक्षत्र होने पर बुधपुष्य के नाम से जाना जाता है। यह योग केवल उन लोगों के लिये लाभदायक है जो किसी भी प्रकार का सट्टे का, शेयर का अथवा म्यूचलफण्ड का कार्य करते हैं। इस योग में इनसे सम्बन्धित जो भी शेयर आदि की खरीदी की जाती है, उसमें लाभ अवश्य ही प्राप्त होता है।


गुरुपुष्य- गुरुवार को पुष्य नक्षत्र होने पर गुरुपुष्य के नाम से जाना जाता है। पुष्य सम्बन्धी समस्त योगों में यह योग सर्वाधिक शुभ माना जाता है। इस योग की प्रतीक्षा समस्त वर्ग के लोग करते हैं फिर भले ही कोई जनसामान्य वर्ग का व्यक्ति हो अथवा कोई व्यवसायी हो। इस योग के समय में बाजार में बहुत ही अधिक खरीदफरोख्त होती है। इस योग में वाहन, स्वर्ण अथवा कोई भी महत्त्वपूर्ण सामग्री का खरीदना अत्यन्त ही शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इस योग में जो भी सामग्री खरीदी जाती है वह चिरस्थाई होती है तथा और अधिक सामग्री खरीदने का सौभाग्य प्त होता है।


 यह योग समस्त भौतिक सामग्री खरीदने के लिये तो अत्यन्त शुभ माना ता है परन्तु इस योग में विवाह नहीं किया जाता है। इस योग में विवाह सम्पन्न होना पूर्णतः निषेद्ध माना गया है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि भगवान राम ने भी कार्तिक कृष्णपक्ष के गुरुपुष्य योग में ही राज्य ग्रहण किया था जिसे आज हम दीपावली के रूप में मनाते हैं तथा पाण्डवों ने भी इसी योग में कौरवों को पराजित कर अपना राज्य वापिस लिया था।


शुक्रपुष्य- शुक्रवार को पुष्य नक्षत्र होने पर शुक्रपुष्य के नाम से जाना जाता है। प्रेम सम्बन्धी कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिये यह योग बहुत शुभ माना जाता है। यद्यपि यह योग प्रेम कार्य के लिये शुभ है परन्तु फिर भी इस योग में विवाह नहीं कराया जाता है क्योंकि इस योग का एक नाम चाण्डाल योग भी है, इसलिये इस योग में अन्य सभी शुभ कार्य निषेद्ध होते हैं।


शनिपुष्य- शनिवार को पुष्य नक्षत्र होने पर शनिपुष्य के नाम से जाना जाता है। यह योग उन लोगों के लिये अधिक शुभ होता है जो किसी भी प्रकार के तंत्र कार्य से जुड़े होते हैं। इस योग में किये जाने वाले समस्त तांत्रिक प्रयोग सफल होते हैं।

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