दुकान व्यवसाय में उन्नति प्राप्ति के टोटके

 दुकान  व्यवसाय में उन्नति प्राप्ति के टोटके 


प्रत्येक व्यक्ति जो अपना व्यवसाय करता है, उसकी यह प्रबल इच्छा होती है कि व्यवसाय में उसे अच्छी आय प्राप्त हो । आज के समय में मध्यम अथवा आम वर्ग का व्यक्ति बहुत कठिनाई से अपना कोई व्यवसाय प्रारम्भ कर पाता है। इसलिये व्यापार शुरू करते ही वह लाभ की आशा करता है। अनेक अवसरों पर ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति के लाख प्रयास करने के उपरान्त भी व्यापार में सफलता प्राप्त नहीं होती। व्यक्ति भरसक प्रयत्न करे, तब भी वह उतनी आय प्राप्त नहीं कर पाता जितनी की वह अपेक्षा करता है। कभी-कभी अनायास रूप से व्यापार में घाटे होने लगते हैं। किसी भी व्यापार में घाटा होने की सम्भावना तो रहती ही है। कुछ लोगों के सामने व्यापार में होने वाले घाटे के कारण अपना व्यवसाय तक बन्द करने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में यह विचार किया जाना चाहिये कि आखिर कुछ लोगों को व्यापार सफलता तथा कुछ को असफलता क्यों प्राप्त होती है ? यहां पर मैं आपको व्यवसाय में सफलता प्राप्त करने के ऐसे सामान्य सूत्रों के बारे में बता रहा हूं जिन पर आपने यदि विचार करके उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया तो अवश्य सफल रहेंगे


> यदि आपका स्वयं का व्यवसाय है तो दुकान अथवा कार्यालय को खोलने का एक निश्चित समय होना चाहिये। अनेक व्यक्ति समय की इस पाबन्दी को ठीक से लागू नहीं कर पाते। वे अपने समय पर आते हैं और अपने समय पर चले जाते हैं। ऐसी स्थिति में कई बार उन्हें लाभ के अवसर प्राप्त होते-होते रह जाते हैं।


> व्यवसाय में सफलता का एक अत्यन्त प्रभावी सूत्र लिख रहा हूं। यदि आप नौकरी करते हैं तो दुकान खुलने से पूर्व दुकान पर पहुंच जायें और अगर आप व्यापार अथवा दुकान करते हैं तो कर्मचारियों के आने से पहले दुकान खोल लें। इसलिये अगर आपका अपना व्यवसाय है तो आप अपने कर्मचारियों के आने से पूर्व दुकान खोलें। इसमें भी यह ध्यान रखें कि दुकान का ताला अपने हाथ से खोलें। जब दुकान बढ़ाने का समय हो तब भी आप स्वयं ही दुकान बढ़ायें। ऐसा कई बार देखने को मिलता है कि जिस व्यक्ति की दुकान है, वह कर्मचारियों के आने के पश्चात् दुकान पर आता है और किसी कर्मचारी को दुकान खोलने के लिये चाबी दे देता है। वहां पर कर्मचारी ही दुकान खोलते हैं और बन्द करते समय भी कर्मचारी ही दुकान बंद करते हैं। इस स्थिति में थोड़ा परिवर्तन करेंगे और स्वयं दुकान खोलेंगे और स्वयं ही बन्द करेंगे तो इसका बहुत ही सुखद परिणाम आपको शीघ्र ही प्राप्त होगा।



> यदि अपनी दुकान की साफ-सफाई अपने हाथ से की जाये तो लक्ष्मी जी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। अधिकांशतः ऐसा देखने में आता है कि दुकान मालिक दुकान खोलकर एक तरफ खड़ा हो जाता है और कर्मचारी लोग दुकान की साफ-सफाई करते हैं। यदि आपका प्रतिष्ठान बड़ा है और प्रतिष्ठान की सफाई करना आपकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध होने के साथ-साथ असम्भव भी है तो आप अपने बैठने के स्थान की सफाई तो स्वयं कर ही सकते हैं। इतना भी यदि आप नहीं करना चाहते हैं तो अपनी टेबिल की सफाई तो अवश्य ही करें। कहने का तात्पर्य केवल इतना है कि आपका प्रतिष्ठान छोटा हो अथवा बड़ा, अगर उसकी साफ-सफाई में योगदान करते हैं तो व्यवसाय में उन्नति शीघ्र प्राप्त होगी।


> प्रत्येक व्यवसाय स्थल में पूजाघर अवश्य होता है। आमतौर पर यहां पर दो विसंगतियां प्रायः देखने को मिलती हैं। पहली यह है कि पूजा का कार्य दुकान मालिक न करके दुकान का ही कोई कर्मचारी करता है और दूसरी यह है कि इस पूजा का कोई निश्चित समय नहीं होता अर्थात् जैसी सुविधा होती है, उसी समय पूजा कर ली जाती है। व्यवसाय की उन्नति के लिये यह दोनों ही बातें गलत हैं। मेरा आपसे यह कहना है कि आपका प्रतिष्ठान छोटा हो अथवा बड़ा हो, वहां आप साफ-सफाई में योगदान करते हैं अथवा नहीं करते, यह अलग बात है, किन्तु कार्यस्थल में पूजा का कार्य आपको स्वयं को ही करना चाहिये। यदि आपका प्रतिष्ठान बड़ा है और आप स्वयं पूजा नहीं कर सकते हैं तो इसके लिये किसी कर्मकाण्डी पुजारी को रखा जा सकता है जो प्रतिदिन आपके निमित्त पूजा करें। दूसरी बात यह है कि आपको एक निश्चित समय पर ही पूजा करनी चाहिये। कुछ लोग 10 बजे दुकान खोलते हैं और काम व्यस्त हो जाते हैं। ऐसे में पूजा का कार्य कभी 11 बजे किया जाता है तो कभी 12 बजे। ऐसी स्थिति में हम जिनकी पूजा करते हैं, उनकी हमें कृपा एवं आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता है। आप दुकान खोलने के बाद और साफ-सफाई करने के बाद पहला काम पूजा करने का करें। यदि आप पूजा का समय निश्चित रखते हैं तो और भी अच्छा है अर्थात् यदि आप 11 बजे पूजा करना चाहते हैं अथवा आपको 11 बजे का समय अधिक सुविधाजनक लगता है तो आप 11 बजे ही पूजा करें। अगर आपने ऐसा किया तो इससे आपको जो फल प्राप्त होगा वह आपकी कल्पनाओं से अधिक होगा।


> आप अपने पूजाघर में जल का एक लोटा अवश्य रखने का प्रयास करें। यह जल प्रतिदिन बदल कर नया भरें। जब आप दुकान खोलें तो पहले दिन का भरा हुआ पानी का छिड़काव अपनी दुकान के आगे करें और लोटे में नया पानी भर कर पूजा करें। जैसे कि आपने सोमवार को लोटे में जल भरकर रखा तो दूसरे दिन इस लोटे के जल से अपने प्रतिष्ठान के सामने पानी से छिड़काव करें और शेष पानी किसी पेड़-पौधे में डाल दें और नया लोटा भरकर पूजा करें। यह जल आपकी सुख-समृद्धि  एवं उन्नति के लिये सहायक होगा

> कोई भी प्रतिष्ठान हो, वह जितनी उन्नति करता है, वह अपने कर्मचारियों के बल पर करता है। आप यह विचार करें कि जिन लोगों को आप वेतन पर अपने यहां रखते हैं, वे कुछ राशि लेकर आपके लिये पूरी मेहनत के साथ काम करते हैं। उनकी मेहनत से जो भी लाभ प्राप्त होता है, वह आपका ही होता है। इसलिये कर्मचारियों के इस योगदान को आप बहुत अधिक महत्त्व दें। कभी किसी भी कर्मचारी पर न तो चीखें-चिल्लायें और न उन्हें अपमानित करने का प्रयास करें। मैंने कई ऐसे प्रतिष्ठान देखे हैं जहां पर दुकान मालिक अपने किसी कर्मचारी की छोटी सी गलती पर जोरदार तरीके से चीख-चिल्लाकर उसका अपमान कर देता है। ऐसी स्थिति में विवशता के कारण कर्मचारी आपके यहां कार्य तो करते हैं किन्तु मन से उनकी अच्छी भावनायें आपके साथ नहीं जुड़ती हैं। यही स्थिति अगर लम्बे समय तक बनी रहती है तो किसी भी दिन आपके संस्थान को बड़ी हानि उठानी पड़ सकती है।


> प्रत्येक व्यवसाय करने वाले को यह निश्चित करना चाहिये कि वह एक महीने में जितनी आय करता है, उसका एक निश्चित भाग पुण्य कार्यों में अथवा दान कार्य में खर्च करेगा। इसके पीछे यह मान्यता रही है कि व्यापार करते समय व्यक्ति को कई बार न चाहते हुये भी झूठ बोलना पड़ता है और कई बार परोक्ष रूप से वह बेईमानी का अपराध भी कर बैठता है। इसके प्रायश्चित के लिये प्रत्येक व्यवसायी को अपनी आय का एक भाग दान-पुण्य में देना चाहिये। आज ऐसा कोई भी व्यवसायी नहीं है, जो यह कहने की स्थिति में हो कि उसने कभी झूठ नहीं बोला अथवा उससे कभी अनजाने में भी बेईमानी न हुई हो। दान-पुण्य के खाते में आप कितना पैसा खर्च करना चाहते हैं यह आपकी इच्छा पर निर्भर करता है। आप चाहें तो एक महीने में 100 रुपये इस खाते में निकाल सकते हैं और चाहें तो 1000 भी निकाल सकते हैं। मेरा इतना ही कहना है कि इस बारे में आप विचार अवश्य करें।


> जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि अनजाने में भी कभी-कभी व्यापार करने वाला बेईमानी का भागीदार बन जाता है। इसके विपरीत कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं जो जान बूझ कर व्यापार में बेईमानी करते हैं। यह बेईमानी वे अनेक रूपों में करते हैं। उनकी इस बेईमानी का शिकार आम और साधारण व्यक्ति ही होता है, जो बड़ी मुश्किल से पैसा कमा पाता है। ऐसे लोगों से यदि कोई अनुचित रूप से अधिक पैसा लेता है तो बेईमानी करने वाले को इसका फल भोगना ही पड़ता है। इस बारे में विद्वानों का यह मानना है कि बेईमानी की कमाई न आपकी जेब में रुकती है और न आपकी तिजोरी में बंद रह सकती है। यदि आप 100 रुपये की बेईमानी करते हैं तो आपकी जेब से 200 रुपये निकल जायेंगे। यह 200 रुपये आपको किसी भी रूप में खर्च करने ही पड़ेंगे और अक्सर यह खर्च बीमारी अथवा दुर्घटना में ही होते हैं। ऐसी स्थिति से बचने योग के लिये व्यापार में जहां तक सम्भव हो, बेईमानी न करें। ईमानदारी से किये गये काम में से भी पर्याप्त आय प्राप्त हो सकती है।


> कई बार आपकी दुकान बहुत अच्छी चलती है तो अन्य लोगों की नजर में आ जाती है। ऐसे में दुकान को नजर लगने का खतरा हो जाता है। ऐसा होता भी में है, जिसमें कई बार लोगों की चलती हुई दुकान में अवरोध उत्पन्न होने लगते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिये आपको सर्व प्रचलित नींबू-मिर्ची का उपाय करना चाहिये। यह उपाय आप मंगलवार अथवा शनिवार को कर सकते हैं। इसमें आप दो हरी मिर्ची के ऊपर एक नींबू और उस नींबू के ऊपर तीन मिर्चियां धागे से पिरो दें। इस नींबू-मिर्च के को अपनी दुकान में ऐसे स्थान पर लगायें, जहां आने-जाने वालों की नजर उस पर पड़े। यदि आपने यह उपाय शनिवार को किया है तो आने वाले शनिवार को इस नींबू-मिर्च को उतारकर चौराहे पर डाल दें और इसकी जगह नया नींबू-मिर्च लगायें।


> आपके प्रतिष्ठान में दिन भर में अनेक लोगों का आना-जाना रहता है। इसमें ऐसे कई लोग भी होते हैं जिनकी दृष्टि आपके व्यवसाय के प्रति अच्छी नहीं होती। ऐसे लोगों की दृष्टि के प्रभाव से कई बार दुकान में नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होने लगती है। इस कारण से अनेक ऐसे व्यवधान उत्पन्न होने लगते हैं जिनके बारे में आपको ठीक से जानकारी नहीं होती है। इसलिये आप प्रत्येक सप्ताह में एक बार इस नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने का उपाय कर सकते हैं। यह उपाय सामान्य, किन्तु अत्यन्त प्रभावी है। इस उपाय के अन्तर्गत आप शनिवार को सुबह 250 ग्राम काले उड़द लेकर अपनी दुकान आयें। इस उड़द को दुकान में ही रखा रहने दें। जब आप दुकान बन्द करके जायें, उससे पहले यह काले उड़द दुकान के अन्दर की तरफ दरवाजे के पास फर्श पर डाल दें। दूसरे दिन जब आप दुकान खोले तो स्वयं इन काले उड़दों को इकट्ठा करके काले कपड़े में बांध कर चौराहे पर डाल दें। आपकी दुकान में जितनी भी नकारात्मक ऊर्जा होगी, वह समाप्त हो जायेगी। यदि आप प्रति सप्ताह इस उपाय को नहीं कर सकते हैं तो इसे तब भी कर सकते हैं जब आपको ऐसा लगे कि दुकान में नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होकर समस्यायें दे रही है।


उपरोक्त सूत्र प्रत्येक दुकान करने वालों के लिये आवश्यक हैं। जो लोग पूंजीपति वर्ग से आते हैं, उन लोगों के लिये सम्भवतः इन सूत्रों की कोई आवश्यकता नहीं है किन्तु जो आम वर्ग के व्यक्ति हैं, जिन पर थोड़े से नुकसान का भी बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है, उन्हें यह उपाय अवश्य करने चाहिये। यह ऐसे सूत्र हैं जिन पर यदि आपने विचार करके अपने जीवन में उतारा तो आपको हानि तो कभी नहीं होगी किन्तु जो फल प्राप्त होगा उससे आप निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसर होते रहेंगे।



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